हर शख़्स में जासूसी का थोड़ा-बहुत कीड़ा तो होता ही है, भले ही वो पड़ोसी के घर में ताक-झाक करने तक ही सीमित हो. यही वजह है कि हमें जासूसी की कहानियां बेहद रोमांचित करती है. अब जो कोई भी Arthur Conan Doyle's केSherlock Holmes को पढ़कर या फिर किसी भी फ़िल्मी जासूसी क़िरदार को देखकर बढ़ा हुआ है, वो इस चीज़ से अच्छी तरह वाकिफ़ होंगे कि एक अच्छी जासूसी फ़िल्म न सिर्फ़ कहानी के ट्विस्ट और टर्न पर बल्क़ि उसमें मुख्य क़िरदार निभा रहे शख़्स के करिश्मे पर भी निर्भर करती है.   

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ऐसे में हम आपके लिए बॉलिवुड में बनी कुछ बेहतरीन जासूसी फ़िल्में लेकर आए हैं, जिनका सस्पेंस आपको अंत तक कुर्सी से उठने नहीं देगा.   

1-डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी!  

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दिबाकर बनर्जी द्वारा निर्देशित ये फ़िल्म ब्योमकेश बक्शी नाम के उपन्यास पर आधारित है, जिसे बंगाल के बेस्‍टसेलर लेखक शरदिंदु बंद्योपाध्याय ने लिखा था. ये क़िरदार पहली बार 1932 में सत्यनवेशी में दिखाई दिया था. वहीं, 2015 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म में डिटेक्टिव ब्‍योमकेश बक्शी का किरदार सुशांत सिंह राजपूत ने निभाया, जो शायद उनका अब तक सबसे बेस्ट रोल रहा है.   

फ़िल्म में सुशांत ऐसे डिटक्टिव का क़िरदार निभा रहे हैं, जो अभी कॉलेज से निकला है और एक रसायन विज्ञानी के लापता होने के मामले की जांच करने लगता है. इस केस के दौरान उसे धीरे-धीरे समझ आता है कि ये मामला महज़ एक शख़्स के लापता होने का नहीं बल्क़ि इन सबके पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है. कहानी में इतनी परतें हैं कि आप एक पल को भी स्क्रीन से नज़र नहीं हटा सकते. ये फ़िल्म अंत तक आपको बांधे रखती है.   

2- मनोरमा : सिक्स फ़ीट अंडर  

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नवदीप सिंह की 2007 की थ्रिलर इस लिस्ट में शामिल होने वाली सबसे डार्क फ़िल्मों में से एक है. ये रोमन पोलांस्की की 1974 की फ़िल्म चाइनाटाउन से प्रेरित है. अभय देओल इस फ़िल्म में सत्यवीर सिंह रंधावा का क़िरदार निभा रहे हैं, जो गैरपेशेवर जासूस है. वो एक छोटे शहर में रहता है, पेशे से वह एक सरकारी इंजीनियर है लेकिन उसका ध्यान इंजीनियरिंग में कम और जासूसी उपन्यास लिखने में ज़्यादा है. उसकी ज़िंदगी तब अचानक बदल जाती है, जब वो एक रहस्यमयी श्रीमती पीपी राठौर से एक काम के बदले में पैसे स्वीकार कर लेता. बस उसके बाद से कहानी में दिलचस्प मोड़ की शुरुआत होती है. उसे समझ आता है कि चीज़ें वैसी नहीं है जैसा वो देख रहा है, बल्क़ि इस खेल में कई बड़ी और ख़तरनाक ताकतें भी शामिल हैं.   

3- बॉबी जासूस  

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पिछली फ़िल्मों के विपरीत बॉबी जासूस को हल्का-फ़ुल्का माहौल दिया गया है, इसमें क़िरदार को डार्क बनाने की कोशिश नहीं की गई है. कुछ हद तक Miss Marple और Nancy Drew की तरह की इसकी कहानी को डील किया गया है. समर शेख़ द्वारा निर्देशिय इस फ़िल्म में विद्या बालन बॉबी जासूस का रोल निभा रही हैं. एक तीस वर्ष की महिला, जो हैदराबाद के एक मध्यमर्गीय परिवार से है.  

यूं तो वो शहर में संघर्ष के छोटे-मोटे मामलों को ही देखती है, लेकिन फिर उसे एक अमीर शख़्स द्वारा दो लड़कियों और एक लड़के को ट्रैक करने के लिए काम पर रखा जाता है. हालांकि, वो ख़ुद को अपने काम के पीछे के मकसद से संघर्ष करती हुई पाती है. बॉबी जासूसी एक मज़ेदार और ताज़ा फ़िल्म है और एक एक मध्यमगर्वीय लड़की को जासूस बनने के लिए घर वालों से जो जद्दोजहद करनी होती है उसे बखूबी निर्देशक ने दिखाया है.  

4- जग्गा जासूस  

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अनुराग बसु द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में जासूसी और अपराध की कहानियों के लिए एक कॉमेडी अप्रोच ली गई है. फ़िल्म में जग्गा यानि रणबीर कपूर की कहानी है, जिसे गोद लेने वाला पिता उसे उसे बोर्डिंग स्कूल में दाखिला कराने के बाद रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं. वो हर साल अपने पिता से एक वीडियो-लेटर प्राप्त करता है और जब वे अचानक आना बंद कर देते हैं, तो वो एक पत्रकार (कैटरीना कैफ) की मदद से मामले की जांच करने का फ़ैसला करता है.  

5- बादशाह  

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अब्बास-मस्तान द्वारा निर्देशित ये फ़िल्म कई ट्विस्ट के साथ ही ज़बरदस्त ह्यूमर से भरपूर है. किंग ख़ान यानि कि शाहरुख़ ख़ान के फ़ैंस के ज़हन में आज भी इस फ़िल्म से जुड़ी यादें ताज़ा होंगी. फ़िल्म में एक से बढ़कर एक हाईटेक गैजट्स का इस्तेमाल किया गया था. चिपकने वाले जूतों से लेकर आर-पार देखने वाले चश्में तक.   

फ़िल्म का क़िरदार राज एक महत्वाकांक्षी जासूस है, जो अपने मृतक पिता के नक्शेकदम पर चलना चाहता है और अपनी ख़ुद की एजेंसी शुरू करता है जिसे बाधशाह डिटेक्टिव एजेंसी कहा जाता है. वो बस एक बड़े मौके की तलाश में होता है. उसे एक छोटी से बच्ची, जिसे कुछ लोगों ने किडनैप कर लिया है, उसे बचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है. लेकिन इसमें इतना कंफ़्यूज़न होता है कि वो न चाहते हुए भी एक बड़े मामले में उलझ जाता है.   

6- बीस साल बाद  

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बिरेन नाग की 1962 की क्लासिक विश्वजीत चटर्जी और वहीदा रहमान अभिनीत एक फ़िल्म है. कहानी का प्लॉट कुछ इस तरह है कि एक लड़की की हत्या ठाकुरों द्वारा कर दी जाती है. लड़की के मरने के बाद उसकी आत्मा अपना बदला लेती है. ठाकुर और उसके बेटे को आत्मा मार देती है. फिर बाद में उनका पोता कुमार अपने पैतृक घर में रहने आता है. उसे स्थानीय लोगों द्वारा चेतावनी दी जाती है कि वो यहां रहेगा तो मारा जाएगा. लेकिन वो किसी की बात पर ध्यान नहीं देता है.   

आगे उसकी मुलाक़ात राधा से होती है, जिसके साथ उसका काफ़ी अच्छा बॉन्ड हो जाता है. जब कुमार की ज़िंदगी पर ख़तरा आता है तो राधा इस बुरी आत्मा की कहानी के पीछे का सच पता करने की कोशिश करती है.