मुग़ल-ए-आज़म हिंदी सिनेमा की ऐतिहासिक फ़िल्म थी. इसे बनाने में तकरीबन 14 साल लगे थे. इसे बनाने वाले महान निर्देशक थे के. आसिफ़. उन्होंने अपने जीवन में सिर्फ़ 3 फ़िल्मों का निर्देशन किया था, जिनमें से दो रिलीज़ हो पाईं थीं. मुग़ल-ए-आज़म बनाकर के. आसिफ़ हमेशा-हमेशा के लिए बॉलीवुड में अमर हो गए.

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मगर अपने दौर की सबसे महंगी और भव्य फ़िल्म को बनाना के. आसिफ़ के लिए कोई आसान बात नहीं थी. 1960 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म का बजट लगभग 1.5 करोड़ रुपये था. उस ज़माने में जहां 4-5 लाख में फ़िल्में बन जाती थीं. उस दौर में किसी फ़िल्म के लिए इतने पैसों का जुगाड़ करना सबसे बड़ी समस्या थी. के. आसिफ़ को इस फ़िल्म के लिए फ़ाइनेंसर कैसे मिला और इस काम में उनकी मदद किसने की, इससे जुड़ी दिलचस्प स्टोरी लेकर आए हैं हम.

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के. आसिफ़ ने बचपन में सलीम और अनार कली की कहानी सुनी थी. तभी उन्होंने तय कर लिया था कि एक दिन वो इनकी स्टोरी पर फ़िल्म बनाएंगे. 1945 में पहली फ़िल्म फूल का सफ़ल निर्देशन करने के बाद उन्होंने इस फ़िल्म को बनाने की तरफ कदम बढ़ाए. स्टोरी उनके पास थी, निर्देशन वो ख़ुद ही करने वाले थे फ़िल्म की कास्ट भी उन्होंने सोच ली थी.

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मगर फ़िल्म को फ़ाइनेंस करने वाला कोई नहीं था. क्योंकि फ़िल्म की स्क्रिप्ट और के. आसिफ़ के नरेशन के अंदाज़ से ही पता चल जाता था कि इसमें बहुत सारे पैसे लगने वाले हैं. इस काम में उनकी मदद की पृथ्वी राज कपूर ने. वो आसिफ़ के हुनर से परिचित थे. इसलिए उन्होंने एक फ़ाइनेंसर जिनके पास अथाह पैसा था उनसे आसिफ़ के लिए बात की.

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इनका नाम था शपूरजी पलौंजी मिस्त्री. हालांकि, उन्हें सिनेमा कतई पसंद नहीं था. पर वो नाटक देखने के बड़े शौक़ीन थे. इसलिए अकसर मुंबई के ओपेरा हाउस में पृथ्वी राज कपूर के नाटक देखने आया करते थे.

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यहां एक दिन पृथ्वी राज कपूर ने आसिफ़ का ज़िक्र करते हुए कहा-'मैं एक ऐसे शख़्स को जानता हूं जो कमाल का निर्देशक है. वो एक फ़िल्म के लिए फ़ाइनेंसर की तलाश में है. आपके पास पैसा है और आपके जैसा शख़्स ही उसके जैसे फ़िल्मों के दीवाने शख़्स की फ़िल्म को फ़ाइनेंस कर सकता है. पता नहीं कितने साल और कितने पैसे लगें, पर मैं इतना यक़ीन से कह सकता हूं कि वो फ़िल्म ऐसी बनाएगा कि लोग उसे हमेशा-हमेशा के लिए याद करेंगे.'

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पृथ्वी राज के कहने पर शपूर जी मान गए और इस तरह मुग़ल-ए-आज़म को उसका फ़ाइनेंसर मिल गया. पर यही एक बात नहीं थी जिसके कारण शपूरजी फ़िल्म में पैसा लगाने के को तैयार हुए थे. जिस तरह आसिफ़ सलीम-अनारकली की स्टोरी में दिलचस्पी रखते थे, उसी तरह शपूर जी की दिलचस्पी अकबर में थी. चूंकि फ़िल्म में अकबर का रोल भी था, जिनकी शख़्सियत के वो कायल थे, इसलिए भी वो फ़िल्म में पैसे लगाने को राज़ी हुए थे.

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शपूरजी के अलावा ख़ुद के. आसिफ़ ने भी इस फ़िल्म में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था. इन 14 सालों में उन्होंने जो भी कमाया था सब इसमें लगा दिया था. मगर उनकी मेहनत रंग लाई और मुग़ल-ए-आज़म दर्शकों को इतनी पसंद आई कि ये फ़िल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई.

थैंक्यू के. आसिफ़ साहब हमें बॉलीवुड की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म देने के लिए.


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