लाइट, कैमरा और चमक-धमक के बीच सादगीभरा जीवन कैसे जीते हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभिनेता फ़ारुख़ शेख़ हैं. फ़ारुख़ साहब ने 'शतरंज के खिलाड़ी', 'उमराव जान', 'क्लब 60', 'बाज़ार' और 'चश्म-ए-बद्दूर' जैसी फ़िल्में कर हम सभी के दिलों में एक ख़ास पहचान बनाई.

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फ़ारुख़ साहब का जन्म गुजरात के बड़ौदा में एक ज़मींदार परिवार में हुआ था, लेकिन इसके बाद वो तमाम ताम-झाम से दूर रहे और हमेशा ही सादगी से रह कर जीवन व्यतीत किया. यही नहीं, अभिनय की दुनिया में तमाम ऊंचाईयां छूने के बावजूद, उन्होंने ख़ुद पर कभी सफ़लता को हावी नहीं होने दिया. इसके साथ ही वो एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने सिर्फ़ अपने अभिनय से ही नहीं, बल्कि नेक कर्मों से भी लोगों का ख़ूब प्यार बटोरा.

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फ़ारुख़ साहब की सबसे अच्छी बात ये थी कि वो कर्म में विश्वास करते थे, फल की चिंता कभी नहीं करते. शायद यही वजह है कि अपने जीवनकाल में उन्होंने कई लोगों की मदद की, लेकिन ख़ुद की ज़ुबान से कभी इसका ज़िक्र तक नहीं किया. कहते हैं कि जब सुपरहिट फ़िल्मों में शुमार 'चश्म-ए-बद्दूर' की शूटिंग चल रही थी, तब एक लाइटमैन छत पर लाइट लगाते हुए नीचे गिर गया और उसे काफ़ी चोट आई. दुर्घटना में जख़्मी लाइटमैन को जल्दी से अस्पताल में भर्ती कराया गया और इसके बाद सभी लोग शूटिंग में व्यस्त हो गये.

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पर वहीं फ़ारुख़ साहब को अंदर ही अंदर उस लाइटमैन की फ़िक्र सताती थी, जिसके चलते वो हर रोज़ उससे अस्पताल मिलने जाते. यहां तक उस लाइटमैन के पूरे इलाज का ख़र्च भी अभिनेता ने ही उठाया और किसी से कुछ कहा तक नहीं. जब फ़िल्म के डायरेक्टर को ये बात पता चली, तो उन्होंने सभी से ये किस्सा शेयर किया.

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फ़ारुख़ साहब के बारे में ये भी कहा जाता है कि वो कभी पैसों के पीछे नहीं भागे, उस दौर में जहां अभिनेता दर्जनों फ़िल्में एक साथ साइन करते थे, तो वहींं वो एक-दो फ़िल्मों के लिये हांमी भरते थे. एक इंटरव्यू के दौरान कलाकार ने कहा था कि 'मुझे स्टारडम से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बस मुझे मेरी मर्ज़ी का काम मिलना चाहिये.'

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25 मार्च 1948 को गुजरात के अमरोली में जन्में फ़ारुख़ शेख़ को स्कूल के दिनों से ही क्रिकेट का काफ़ी शौक था. क्रिकेट के इस लगाव की वजह से वो सुनील गावस्कर के काफ़ी करीबी माने जाते थे.

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हिंदी सिनेमा में कई अभिनेता आयेंगे, जायेंगे, पर फ़ारुख़ साहब की कमी हमेशा खलेगी.