बॉलीवुड के 'एक्शन किंग' अक्षय कुमार (Akshay Kumar) हर साल कोई न कोई बायोपिक अपने फैंस के लिए ज़रूर लेकर आते हैं. साल 2023 में भी उन्होंने दर्शकों के लिए एक इंस्पिरेशनल मूवी 'गोरखा' रिलीज़ करने की प्लानिंग कर ली है. फ़िल्म की कहानी भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट (5वीं गोरखा राइफल्स) के मेजर जनरल इयान कारडोज़ो (Major General Ian Cardozo) के बारे में है. इन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अपने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था.

मेजर जनरल इयान कारडोज़ो (Major General Ian Cardozo) की कहानी जाबांजी की मिसाल है. तो आइए बड़े पर्दे पर फ़िल्मी ढंग से उनकी स्टोरी देखने से पहले आपको यहां उनकी रियल स्टोरी बता देते हैं.

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मेजर जनरल इयान कारडोज़ो (Major General Ian Cardozo)

कौन हैं मेजर जनरल इयान कारडोज़ो?

मेजर जनरल इयान कारडोज़ो ने पाकिस्तान के सिलहट शहर में हुई लड़ाई में पाकिस्तानी सैनिकों की हालत पतली कर दी थी. इंडो-पाकिस्तान युद्ध के कुछ बंदियों को छुड़ाते समय उनका एक पैर लैंडमाइन ब्लास्ट में पूरी तरह ज़ख़्मी हो गया था. उनके पैर के पूरी तरह चीथड़े उड़ चुके थे. युद्ध के समय दर्द कम करने वाली दवाई का सारा स्टॉक तबाह होने के चलते उनके इलाज़ के लिए कुछ भी न बचा था. लेकिन इस मुश्किल की घड़ी में उनका हौसला ज़रा भी न डगमगाया और उन्होंने तुरंत खुख़री से अपना एक पैर काटकर शरीर से अलग कर दिया. पैर अलग करने के बाद मेजर जनरल ने अपने साथी को इसे थमाते हुए कहा, 'जाओ इसे कहीं दफ़न कर आओ'

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वॉर स्टोरीज़ के थे दीवाने

07 अगस्त 1937 को मुंबई के आम परिवार में जन्मे इयान कारडोज़ो को बचपन से ही युद्ध की कहानियां आकर्षित करती थीं. वर्ल्ड वॉर की स्टोरीज़ पढ़ने-सुनने के शौक़ीन इयान को अपने सीनियर से आर्मी में सर्व करने की इंस्पिरेशन मिली. बची-कुची कसर 'Bugles and a Tiger' क़िताब ने पूरी कर दी. ये क़िताब जॉन मास्टर्स ने लिखी थी, जिन्होंने 4th गोरखा राइफल्स में सर्व किया था. बस यहीं से इयान ने गोरखा अफ़सर बनने की ठान ली. उन्होंने तय कर लिया था कि बनेंगे तो गोरखा अफ़सर ही. 

कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका दाखिला नेशनल डिफेंस एकेडमी में हुआ. इसके बाद उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी में अपनी ट्रेनिंग की. इसके बाद वो 5 गोरखा राइफ़ल्स में सेलेक्ट हुए और कई जंग का हिस्सा बने.

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1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध ने मेजर जनरल की दुनिया ही बदल दी

03 दिसंबर 1971. ये वो दिन था जब पाकिस्तान ने भारत के 11 एयर स्टेशन पर एरियल स्ट्राइक कर दी थी. पीठ पीछे की गई पड़ोसी देश की इस कायराना हरकत का मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित करते हुए पाक के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया. उस दौरान कारडोज़ो स्टाफ़ कॉलेज से एक कोर्स कर रहे थे. उसी वक्त ख़बर आई कि उनकी बटालियन के सेकेंड इन कमांड शहीद हो गए हैं. उनकी रिप्लेसमेंट के तौर पर कारडोज़ो को चुन लिया गया. 

ये उनके लिए पहला मौका था, जब वो कोई 'हेलिबॉर्न ऑपरेशन' का हिस्सा थे. इस तरह के ऑपरेशन में जवान युद्ध क्षेत्र में घुसते हैं और ग्राउंड फ़ोर्स कमांडर से ऑर्डर लेते है. ये सब इतना इमरजेंसी में हुआ कि 4/5 गोरखा को इसके लिए प्लानिंग और तैयारी करने का भी मौका नहीं मिल पाया. 

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विरोधी मुल्क की बटालियन को धर दबोचने का था मिशन 

मिशन साफ़ था 4/5 गोरखा को सिलहट ज़िले के ग़ाज़ीपुर से होते हुए सिलहट शहर तक पहुंचना था. यहां उनका लक्ष्य सामने वाली बटालियन आर्मी को धर दबोचना था. मगर मेजर जनरल इयान कार्डोज़ो के सामने दो दिक्कतें थीं. पहली कि उन्हें बिना किसी आर्टिलरी फ़ायर के दुश्मन को बंदी बनाना था. दूसरा उनकी बटालियन के सामने बटालियन थी. एक बटालियन में 900 सैनिक होते हैं, जिनको अपने काबू में करने के लिए ब्रिगेड को भेजा जाता है. एक ब्रिगेड में 3000 सैनिकों का काफ़िला होता है. 

मेजर जनरल ने जीत के लिए चली ये बाज़ी

इस युद्ध की लाइव कवरेज़ बीबीसी कर रहा था, जिसे भारत और पाकिस्तान की आर्मी दोनों सुन रही थी. उस वक्त बीबीसी ने ग़लती से ब्रॉडकास्ट कर दिया कि भारतीय सेना की तरफ़ से ब्रिगेड युद्ध के मैदान की तरफ़ बढ़ रही है. जबकि भारतीय सेना के पास सिर्फ़ बटालियन थी. इस न्यूज़ को सुनकर बड़ी ही चालाकी से इयान कारडोज़ो ने अपने साथियों से कहा कि पाकिस्तानी सेना इस बात से अनजान हैं कि हमारे पास सिर्फ़ बटालियन है, तो ब्रिगेड की तरह ही पेश आते हैं.

काफ़ी लंबे समय तक चली इस जंग में एक रात गोरखा खुखरी लेकर विरोधी सैनिकों पर टूट पड़े. खंजर. मार-काट, चीखें, लाशें, चारों तरफ़ खून की नदियां, बस चारों तरफ़ इसके अलावा और कुछ भी मंज़र नहीं था. धीरे-धीरे भारतीय सेना, पाकिस्तानी सेना पर हावी हो रहे थे. अंत में गोरखा के 56 इंच के सीने के आगे पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने घुटने टेकने में ही भलाई समझी. बाद में पता चला कि पाकिस्तानी सेना दो-दो ब्रिगेडियर से लड़ रही थीं.  

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पाकिस्तानी सर्जन ने किया था ऑपरेशन

इयान कारडो के अपना पैर अलग करने के बाद एक बंदी बनाए पाकिस्तान सर्जन को उनके इलाज़ के लिए लाया गया. लेकिन कारडोज़ो ने उनसे ऑपरेशन न करवाने की ज़िद पर अड़े रहे. उनका कहना था, 'बेवकूफ की मौत मर जाऊंगा, लेकिन पाकिस्तानी खून नहीं लूंगा'. काफ़ी प्रयासों के बाद उन्हें मनाया गया और पाकिस्तान के मोहम्मद बशीर ने उनका इलाज़ किया. 

बाद में उन्होंने आर्टिफिशियल पैर का सहारा नहीं लिया. वो लगातार अपनी फ़िटनेस पर ध्यान देते रहे और उसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की. जब उनका आर्मी में फिज़िकल टेस्ट हुआ, तो उन्होंने 7 जवानों को अपने पीछे छोड़ दिया. बाद में आगे चलकर वो ब्रिगेड और बटालियन के कमांडर बने. ऐसा अचीवमेंट हासिल करने वाले वो पहले 'वॉर डिसेबल्ड ऑफ़िसर' बने. 

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मेजर जनरल इयान कारडोज़ो पर बन रही फ़िल्म 'गोरखा' उनकी इच्छाशक्ति और बहादुरी के प्रति एक ट्रिब्यूट होगी.