‘जब तक बैठने को न कहा जाए तब तक शराफ़त से खड़े रहो’. इस डायलॉग को पढ़ने के बाद ही आप समझ गए होंगे कि हम किसकी बात करने जा रहे हैं. आज बात होगी 70-80 के दशक के एंग्री यंग मैन की छवि गढ़ने वाले एक्टर अमिताभ बच्चन की. वो लगभग 6 दशकों से हमारा मनोरंजन करते आ रहे हैं.

इस दौरान अमिताभ बच्चन ने दर्शकों को कई यादगार फ़िल्में और किरदार दिए, जिसमें वो अपनी झलक तलाशते नज़र आते हैं. ऐसा ही एक किरदार था एंग्री यंग मैन का जिसमें 70 के दशक के लोग अपना अक्श तलाशा करते थे. इस किरदार को कैसे गढ़ा गया और वो लोग कौन थे, उसी की तह तक आज हम जाएंगे. इसी किरदार को गढ़ने वाले लोगों और फ़िल्मों ने ही हमें अमिताभ बच्चन जैसा टैलेंटेड सुपरस्टार दिया था. 

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प्रेस ने दी थी 'एंग्री यंग मैन' की संज्ञा  

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अमिताभ बच्चन जब फ़िल्म इंडस्ट्री में आए थे तो उनकी कुछ शुरुआती फ़िल्में फ़्लॉप रही थीं. फिर उनकी झोली में उनकी ख़ुशक़िस्मती से 'जंजीर' आ गई. जिसे ओमप्रकाश मेहरा जी ने निर्देशित किया था. कहानी लिखी थी सलीम-जावेद की जोड़ी ने. इसमें पहली बार उन्होंने विजय नाम का किरदार निभाया था जिसे प्रेस ने एंग्री यंग मैन की संज्ञा दी थी. ये वो दौर था जब लोगों को क़ानून और व्यवस्था पर बिलकुल विश्वास नहीं था और वो इसकी बेड़ियों को तोड़ नई उड़ान भरना चाहते थे. 

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ऐसा था 'विजय' का किरदार 

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विजय का किरदार भी कुछ ऐसा ही था वो अपने जीवन का कंट्रोल अपने हाथ में लेता है और क़ानून-व्यवस्था की उपेक्षा करता क्योंकि यहां उसका दम घुट रहा होता है. इससे बाहर निकलने के लिए वो अपना एक अलग ही रास्ता बनाता है. अमिताभ ने 'दीवार', 'त्रिशूल', 'डॉन', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'काला पत्थर', 'लावारिस', 'शक्ति' जैसी फ़िल्मों में इस एंग्री यंग मैन वाले किरदार के अलग-अलग पहलुओं को जिया था. उनके किरदार को अधिकतर सलीम-जावेद ने अपनी कलम से आत्मसात किया था. 

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जावेद अख़्तर इसके बारे में कहते हैं- 'आपातकाल का समय था और असैंवधानिक ताक़तें सिर उठा रही थीं. इससे आम आदमी परेशान था और उसका समाजवाद का सपना टूट रहा था. वो कुछ भी कर के इसे रोकना चाहता था. उस समय को ध्यान में रखकर हमने ये विजय वाला किरदार गढ़ा था.' 

अमिताभ के लिए नहीं लिखा गया था किरदार  

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हालांकि, जावेद साहब बताते हैं कि अमिताभ को ध्यान में रखकर पहली बार उनकी जोड़ी ने किरदार नहीं गढ़ा था. वो कहते हैं कि वो तो उस समय के हिसाब से लिखा गया था. वैसे उनसे पहले 'मदर इंडिया' का बिरजू (सुनील दत्त) और 'गंगा जमना' के गंगा(दिलीप कुमार) में लोग इस छवि को देख चुके थे. ये तो उसका लेटेस्ट वर्ज़न था. 

दीवार के लिए अमिताभ नहीं थे पहली पसंद

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फ़िल्म 'दीवार' के बारे में बात करते हुए सलीम ख़ान बताते हैं कि इसके लिए यश चोपड़ा की पहली पसंद राजेश खन्ना था, मगर फ़िल्म की कहानी सलीम-जावेद ने अमिताभ को ध्यान में ही रखकर लिखी थी क्योंकि उन दोनों ने अमिताभ की क़ाबिलयत को पहचान लिया था और वो जानते थे कि इस कैरेक्टर को उनसे ज़्यादा अच्छी तरह से कोई नहीं निभा सकता. 

अमिताभ देते हैं सलीम-जावेद को क्रेडिट

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उन्होंने ख़ुद इस रोल को अमिताभ बच्चन को देने के लिए यश चोपड़ा को राज़ी किया था. बाद में जो हुआ वो तो सभी जानते हैं. अमिताभ भी हमेशा सलीम-जावेद को क्रेडिट देते हुए कहते हैं कि उनका लेखन ही ऐसा था कि उनकी जगह कोई और भी उनके लिखे किरदारों को निभाता तो वो सुपरस्टार बन जाता.

अमिताभ और एंग्री यंग मैन को ध्यान में रख कर लिखी जाने लगी स्क्रिप्ट  

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ख़ैर इसके बाद तो इंडस्ट्री में अमिताभ और एंग्री यंग मैन को ध्यान में रखते हुए किरदार लिखे जाने लगे. 'मुकद्दर का सिकंदर', 'सुहाग', 'लावारिस' जैसी फ़िल्मों में इसकी बानगी दिखती है. इनमें से कुछ के संवाद मरहूम एक्टर-राइटर कादर ख़ान ने लिखे थे. वो कहते हैं- 'अमिताभ में भाषण देने और डायलॉग डिलीवर करने की एक कला थी जो उनके अंदर मौजूद थी. उसका सही इस्तेमाल हो इसे ध्यान में रखकर ही किरदार लिखे जाते थे. जो भी राइटर उनके लिए स्क्रिप्ट लिखता था वो अमिताभ की प्रतिभा का संपूर्ण इस्तेमाल करने के हिसाब से ही कलम चलाता था.' 

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वैसे अमिताभ बच्चन की कड़ी मेहनत और प्रतिभा को यहां नकारना भी ग़लत होगा. उनके जैसा एक्टर न होता तो शायद एंग्री यंग मैन वाले किरदार हमारे ज़ेहन में यू हमेशा-हमेशा के लिए रचे-बसे न रहते.