बॉलीवुड अभिनेता नीरज वोरा अब नहीं रहे. उन्होंने कई फ़िल्मों में न सिर्फ़ शानदार अभिनय किया बल्कि कई फ़िल्मों की स्क्रीप्ट लिखी और कई फ़िल्में डायरेक्ट भी कीं.

नीरज वोरा अब इस दुनिया में नहीं रहे. वे एक साल से कोमा में थे, इस दौरान उनके सबसे अच्छे दोस्त फ़िरोज़ नाडियाडवाला ने उनका पूरा ध्यान रखा. इन दोनों की दोस्ती पर Ninad Vengurlekar ने एक बहुत ही मार्मिक पोस्ट लिखा है.

अक्टूबर 2016 में फ़िरोज़ नाडियाडवाला से कहा गया था कि नीरज वोरा के पास जीने के लिए हैं सिर्फ़ कुछ घंटे. लेकिन डॉक्टरों की बात ग़लत साबित हुई और नीरज 1 साल तक जीवित रहे. फ़िरोज़ ने जो नीरज के लिए किया वो बॉलीवुड में या असल ज़िन्दगी में देखने को कम ही मिलती है.

जब डायरेक्टर, कमिडियन और स्क्रीप्ट राइटर नीरज वोरा ने इस दुनिया को अलविदा कहा तो मैंने इसे किसी दूसरी न्यूज़ की तरह ही पढ़ा. मुझे बुरा लगा लेकिन ये उतनी चौंका देने वाली बात नहीं थी क्योंकि मैंने सुना था कि नीरज पिछले कुछ महीनों से कोमा में थे. पर मेरा ध्यान इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर पर गया. उसमें लिखा था कि प्रोड्यूसर फ़िरोज़ नाडियाडवाला ने नीरज की सालभर से ज़्यादा वक़्त से देखभाल की.

पिछले साल अक्टूबर में नीरज वोरा को ब्रेन हैमरेज हुआ और वो कोमा में चले गए. उन्हें एम्स दिल्ली में भर्ती किया गया. फ़िरोज़ नाडियाडवाला के लिए नीरज ने कई हिट फ़िल्में जैसे 'हेरा फ़ेरी', 'आवारा पागल दिवाना', 'फिर हेरा फेरी' की स्क्रीप्ट लिखी थी और कई फ़िल्में डायरेक्ट भी की थी. फ़िरोज़ ने उन्हें एयरलिफ़्ट कराया और मुंबई स्थित अपने घर ले आए. उन्होंने अपने ही घर के एक कमरे को आईसीयू की तरह बनाया और नीरज का पूरा मेडिकल ख़र्च वहन किया. सिर्फ़ डॉक्टर्स ही नहीं, मेडिकल एक्सपर्ट्स, दवाईयां, नर्स, डायटिशीयन, कूक सबका ख़र्च उठाया.

यही नहीं, फ़िरोज़ ने उस कमरे में नीरज के माता-पिता की तस्वीरें भी लगाईं. रोज़ नीरज के कमरे में वो शास्त्रीय संगीत और हनुमान चालीसा चलाते थे.

इतने सब के बाद भी नीरज इस दुनिया को छोड़कर चले गए.

फ़िरोज़ को उनके जाने का बहुत दुख हुआ, ख़ुद को संभालते हुए उन्होंने कहा,

'नीरज को मैं 19 अक्टूबर को दिल्ली से मुंबई ले आया था. एक साल से ज़्यादा हो गया था उस दिन को जब डॉक्टर्स ने कहा था कि नीरज कुछ घंटों के लिए ही ज़िन्दा रहेंगे. मुझे नहीं पता की कौन सी शक्ति ने मुझे नीरज की सेवा करने की प्रेरणा दी. लेकिन मैं उस वक़्त उसे मरने के लिए नहीं छोड़ सकता था. उसकी देखभाल करने के लिए कोई नहीं था. नीरज का एक भाई था. लेकिन वो भी आर्थिक तौर पर उतना सुदृढ़ नहीं था. मैं नीरज को 12 सालों से जानता था. हमने कई फ़िल्मों में साथ काम किया था और हम काफ़ी करीबी दोस्त थे. तो फिर मैं उसे मरने के लिए कैसे छोड़ देता. मैं ऐसा करने के बाद कैसे जीता?'

नीरज का अंतिम संस्कार भी फ़िरोज़ ने ही किया वो भी पूरे हिन्दू रीति-रिवाज़ के साथ.

लेकिन ऐसा कौन करता है- वो भी बॉलीवुड में, जहां नाम, शौहरत, रिश्ते सब पैसों के ही मुरीद हैं.

फ़िरोज़ नाडियाडवाला बहुत अलग हैं. मैंने 1997-99 के बीच उनके साथ काम किया था और मुझे पता था कि वो ऐसा कुछ कर सकते हैं. उनके पास सोने का दिल था. मैं पिछले 2 दशकों से उनके संपर्क में नहीं हूं लेकिन मुझे पता ही कि वे ज़रा भी नहीं बदले होंगे.

एक बार उन्होंने मुझे बिना किसी ग़लती के निकाल दिया था, बाद में जब उन्हें पता चला तो उन्होंने मुझे फ़ोन कर के माफ़ी मांगी थी. एक बार मैं उनकी उम्मीदों पर ख़रा नहीं उतरा तो उन्होंने मुझे बुलाकर कहा था कि उन्हें मुझसे ये उम्मीद नहीं थी और वो मुझे अपने छोटे भाई की तरह देखते हैं. मुझे लगा था कि वे ऐसे ही बोल रहे हैं.

एक बार वो अपनी Porsche में हमारे ऑफ़िस आए थे. रात काफ़ी हो गई थी. मीटिंग के बाद जब मैं उन्हें बाहर तक छोड़ने गया तो Porsce देखकर मेरी आंखें चौंधिया गई. उन्होंने मेरी ये हरकत देख ली. उन्होंने मुझे घर छोड़ने का ऑफ़र दिया. मैंने कहा विले पारले. वे मुझे वर्ली सीफ़ेस से होते हुए जुहू तक ले गए. ये उनके लिए बहुत छोटी बात थी, लेकिन ये मेरे लिए Lifelong Experience था.

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर ने मुझे भावुक कर दिया. फ़िरोज़ ने अपने दोस्त की ज़िन्दगी के लिए वो सब किया जो मुनासिब था.

फ़िरोज़ और नीरज की दोस्ती जैसी दोस्ती कम ही देखने को मिलती है. उनकी दोस्ती को देखकर अब भी लगता है कि इस देश में इंसानियत बाकी है.

फ़िरोज़ और नीरज की दोस्ती हम सब के लिए एक मिसाल है. फ़िरोज़ कहीं न कहीं ये मालूम था कि नीरज की ज़िन्दगी ज़्यादा लंबी नहीं है. लेकिन उन्होंने आख़िर तक अपने दोस्त का साथ दिया. दोस्ती, तो दोस्ती होती है. ये अलग बात है कि आज के ज़माने में इसके मायने काफ़ी बदल गए हैं.