कुछ महीने पहले ही महराष्ट्र सरकार राज्य में जादू-टोने और अंधविश्वास जैसी घटनाओं से निपटने के लिए क़ानून लेकर आई थी. इस क़ानून का मकसद अंधविश्वास और जादू-टोने जैसी घटनाओं को रोकना और उनका प्रसार होने से रोकना था, पर सरकार की तमाम तरह की कोशिशों और स्वयंसेवी संगठनों के जागरूकता अभियान के बावजूद ऐसी घटनाओं में कोई कमी आती नहीं दिखाई दे रही.

ताज़ा मामला ठाणे ज़िले के अंबरनाथ का है, जहां एक परिवार ने अपने बेटे के मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार सिर्फ़ इसलिए नहीं किया, क्योंकि उनको उम्मीद थी कि वो दोबारा ज़िंदा होगा. बेटे को ज़िंदा करने के लिए परिवार ने लाश को ताबूत में रख कर लगातार 10 दिनों तक चर्च में ईश्वर की प्रार्थना की. जैसे ही पुलिस को इस बार की ख़बर लगी उसने तुरंत कार्यवाही की और घटना स्थल पर पहुंच कर लड़के का अंतिम संस्कार करवाया.

ख़बरों के मुताबिक, 17 साल के मिसहक नवीस की मौत कैंसर की वजह से हो गई थी. नसीव के पिता खुद नागपाड़ा के चर्च में पादरी हैं, जिनका मानना था कि जीसस के सामने बेटे की लाश रख कर प्रार्थना करने पर उनका बेटा दोबारा ज़िंदा हो जायेगा. पादरी के कहने पर ही नसीव की लाश को बिजली से ठंडा रहने वाले एक कॉफ़िन में रखा गया, जिसके बाद नसीव को ज़िंदा करने की प्रक्रिया शुरू हो गई. किसी ने इस घटना की जानकारी पुलिस को दे दी, जिसके बाद पुलिस हरकत में आई, पर पुलिस के लिए भी नसीव का अंतिम संस्कार आसान नहीं था. पुलिस को परिवार के लोगों का विरोध झेलना पड़ा, पर सख्ती करने पर परिवार वाले अंतिम संस्कार के लिए राज़ी हो गए.

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पुलिस के जाने पर परिवार वालों ने फिर से प्रार्थना शुरू कर दी, जिसकी सूचना मिलने पर पुलिस दोबारा घटनास्थल पर पहुंची और परिवार वालों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने का ख़ौफ़ दिखा कर लड़के का अंतिम संस्कार कराया.

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