जिन किसानों के हिस्से कर्ज़ आया हो, उन्हें चैन की नींद नहीं आती. दिल्ली जैसे शहर में दो वक़्त की रोटी उस किसान के लिए बहुत भारी पड़ती है, जिसके घर का तिनका-तिनका कर्ज़ में डूबा हो. तमिलनाडु से कर्ज़ माफ़ी की उम्मीद में दिल्ली आये धरना प्रदर्शन करने वाले किसानों का न जाने क्या हाल होता, अगर उन्हें बंगला साहिब की ओर से लंगर नहीं पहुंचाया जाता.

लंगर खा रहे हैं तमिलनाडु के किसान

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जंतर मंतर पर आन्दोलन कर रहे किसानों को, गुरुद्वारा बंगला साहिब आज भी  लंगर बांट रहा है. NDTV की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बंगला साहब, दिल्ली में रहने वाले तमिलनाडु के आन्दोलनकारियों को, करीब तीन महीने से लंगर बांट रहा है. तमिलनाडु से आने वाले वो किसान भी जिन्होंने आन्दोलन में हिस्सा नहीं लिया है और जो रोज़ी-रोटी की तलाश में दिल्ली आये हैं उनमें भी लंगर बांटा जा रहा है. 

तमिलनाडु ने पिछले 60 सालों में सबसे भयंकर सूखा इन दिनों देखा है. ज़मीन में नमी नहीं है, तो धरती से अनाज कहां से उपजे? औसत से 60 प्रतिशत कम बारिश झेलने वाले तमिलनाडु के किसान कर्ज़ में पूरी तरह डूब चुके हैं लेकिन सरकार इनकी ओर से बेसुध है.

जब सरकार का ध्यान खींचने के लिए किसानों ने पिया पेशाब

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इन किसानों ने पेशाब पीया, मल खाया, चूहों को दांतों तले दबाये रखा, ख़ुद को पीटा, संसद के सामने नंगे तक हो गए, लेकिन सरकार ने इन पर ध्यान नहीं दिया.

सरकार के पास तमाम ग़ैर ज़रूरी मुद्दे हैं मसलन गौरक्षक, गौभक्षक, राष्ट्रप्रेमी, राष्ट्रद्रोही लेकिन सरकार की बहस से ज़रूरी मुद्दे ग़ायब हैं. प्रधानमंत्री अकसर कहते हैं कि किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन इसी रीढ़ में लकवा मार गया है, ये सरकार को नहीं दिखता. न केंद्र सरकार को रीढ़ की बीमारी समझ में आ रही है, न राज्य सरकार को.

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष मंजीत सिंह का कहना है कि-

जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसान बहुत दूर से आये हैं. उन्हें न तो हमारी भाषा पता है, न ही खाने का ठिकाना. ऐसे में हम उन्हें दिन में दो बार लंगर पहुंचाते हैं. खाने के पैकेटों में हम खीर, रोटी, दाल और सब्ज़ी इनके लिए भिजवाते हैं.
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इन किसानों के लिए गुरुद्वारे की ओर से मिलने वाली ये मदद बहुत राहत भरी है. जब वे अपने-अपने खेतों में काम करते हुए भी, दो वक़्त की रोटी नहीं खा पाते थे, ऐसे में दिल्ली में रहने का ख़र्च वे कैसे उठा पाते.

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किसानों की आत्महत्या थम नहीं रही है. एक तरफ़ उन पर प्रकृति की मार है, दूसरी तरफ़ बैंको से मिले भारी भरकम कर्ज़ और ब्याज़. ऐसे में किसान किससे आस लगाये? केंद्र सरकार सुन नहीं रही है, अगर राज्य सरकार सुनती तो उन्हें सब कुछ छोड़ कर दिल्ली क्यों आना पड़ता?

शायद गुरुद्वारे की प्रबंधन समिति को लग गया है कि किसानों से लाचार कोई है नहीं. अगर ये भूखे रहे तो लंगर चलाने का कोई अर्थ नहीं है. गुरुद्वारे ने भूखे किसानों का पेट तो भर दिया है, लेकिन क्या सरकार भी इन किसानों की ज़िन्दगी में खुशियों के रंग भर सकेगी?

उम्मीद तो यही है. देर से ही सही लोकतंत्र में सबकी बात सुनी जाती है. सरकार भी कब तक अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ेगी. कभी न कभी इन किसानों की सुधि, सरकार ज़रूर लेगी.