समाज में जिस अनुपात में आपको मोटे या पतले लोग मिलते हैं, क्या आपको उस अनुपात में मीडिया के किसी भी रूप में ये लोग दिखते हैं? अगर दिख भी जाएं. तो उनको समान व्यवहार वाला नहीं दिखाया जाता. या तो वो किरदार मसखरा होगा या फिर बेवकूफ़. बहुत कम ऐसे किरदार दिखेंगे, जो मोटे या पतले होने के बावजूद भी समान व्यवहार के होंगे. ये बात सदियों पहले भी सच थी और आज भी है. ख़ासकर महिलाओं के लिए और मोटी महिलाओं के लिए.

टुनटुन तो याद होगी न आपको! जो 60 के दशक में हिरोईन की दोस्त बना करती थी और जिनका इस्तेमाल सिर्फ़ उसका मज़ाक उड़ाना करने के लिए और हिरोइन को अच्छा दिखाने के लिए किया जाता था.

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आप कह सकते हैं कि ये तो पुरानी बात है, तब लोगों में ऐसी समझ विकसित नहीं हुई थी. ठीक है, आगे बढ़ते हैं, 'कल हो न हो' की स्वीटू तो ज़्यादा पुरानी नहीं हुई. वो कैसी थी? थी तो सामान्य ही. एक लड़की जो अच्छा दिखना चाहती है, डेट पर जाना चाहती है लेकिन फ़िल्म में उसे ख़ास तौर पर ठरकी दिखाया गया, जो प्यार के लिए मरी जा रही है.

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कुछ ही साल पहले एक और फ़िल्म आई थी, 'दम लगा कर हईशा', जिसकी मुख्य किरदार मोटी थी और पढ़ी लिखी थी और उसका पति पतला था लेकिन अनपढ़ था. मोटापे की वजह से उसे उसकी पत्नी नहीं पसंद थी. हालांकि फ़िल्म का एक उद्देश्य मोटापे की समस्या को उठाना भी था. लेकिन जैसा फ़िल्म में दिखाया गया वैसा हकीक़त में होता है? प्रतियोगिता जीत जाने से मोटे लोग समाज में इज़्ज़त पा जाते हैं? उनकी ज़िंदगी सामान्य हो जाती है?

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छोटे पर्दे पर भी आते हैं. कमिडियन कपिल शर्मा अलग-अलग चैनल्स पर अलग शो लेकर आते थे. उसमें कीकू शारदा एक महिला का किरदार भी निभाते थे. फूहड़ हंसी के लिए उस किरदार के ऊपर तमाम तरह के भद्दे मज़ाक किए जाते थे और उससे बुरी बात ये है कि लोग उसपर हंसते भी थे.

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विज्ञापन जगत का हाल तो और बुरा है. आपको शायद ही कोई विज्ञापन दिखे, जिसमें मोटे लोगों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है. उनको ऐसे प्रदर्षित किया जाता है जैसे उनका मोटापा उनके स्वास्थय के लिए ही नहीं, उनके जीवन और समाज के लिए भी अच्छा नहीं है. अगर जल्द से जल्द वो एक ख़ास आकार में नहीं ढल जाएंगे, तो उनकी ज़िंदगी बर्बाद ही मानी जाएगी.

इस श्रेणी में ख़बरिया चैनल भी आ जाएंगे. आपको इके-दुक्के ही टीवी एंकर और प्रज़ेंटर दिखेंगे जो मोटे हों. ये चैनल वाले ये मान बैठे हैं कि मोटे लोग या तो प्रतिभाहीन होते हैं या अच्छे दिखते नहीं. इनकी अच्छी दिखने की परिभाषा को मैं घटिया ही नहीं, अश्लील मानता हूं.

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ऊपर लिखी बातें जितनी सच महिलाओं के लिए हैं, उतनी ही पुरुषों के लिए भी. फिर भी समाज में पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले अपने वज़न के लिए कम संघर्ष करना पड़ता है. हालांकि अव्वल तो यही होता कि हमारा समाज लिंग और वज़न के पार जा कर सभी आकार के लोगों के साथ सामान्य व्यवहार करता, काश ऐसा हो पाता!