फ़िल्में बनाना आसान काम नहीं होता. इस बात से तो आप वाकिफ़ ही होंगे. ये एक टीम वर्क होता है, जिसे बहुत से लोग मिलकर अंजाम तक पहुंचाते हैं. अगर आपको कभी किसी फ़िल्म के सेट पर जाने का मौका मिला, तो आपने एक बात ज़रूर नोटिस की होगी. वो ये कि वहां काम कर रहे अधिकतर कर्मचारी पुरुष होंगे. हालांकि, वक़्त के साथ यहां भी बदलाव आया और इस फ़ील्ड में भी महिलाओं की एंट्री हुई है. यहां बात एक्टर-डायरेक्टर ही नहीं, फ़िल्म निर्माण से जुड़े हर डिपार्टमेंट की हो रही है.

आज हम आपको एक ऐसी महिला से मिलवाएंगे, जिसने अपने काम से न सिर्फ़ मर्दों को अपनी सोच बदलने को मजबूर कर दिया, बल्कि अपने और दूसरी औरतों के लिए भी सम्मान अर्जित करने में कामयाब रहीं.

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हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की पहली और एकमात्र फ़ीमेल गैफ़र हेतल देधिया की. इससे पहले हम आपको हेतल की संघर्ष भरी और प्रेरणादायक कहानी के बारे में विस्तार से बताएं, आपको ये जान लेना चाहिए कि गैफ़र किस चिड़िया का नाम है.

एक गैफ़र कैमरामैन के लिए की-पर्सन होता है, जिसके ऊपर सेट पर इस्तेमाल होने वाली सभी लाइट्स को संभालने का ज़िम्मा होता है. इसके बिना कैमरामैन अपना कार्य कर ही नहीं सकता. इसके साथ ही उसे बहुत सी इलेक्ट्रिक और टेक्निकल बातों का भी ध्यान रखना होता है.

ये ऐसा काम है, जिसमें आपको भारी-भरकम लाइट्स को उठाना, उन्हें हैंडल करना, नट और टूल्स को कसना यानि कि बहुत सारा शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है. ज़ाहिर है ऐसा करना किसी के लिए भी बहुत ही मुश्किल होता है. साथ ही मर्दों के दबदबे वाले इस प्रोफ़ेशन में एक महिला को उनके ताने और चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता था.

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हेतल देधिया ने 19 साल की उम्र में जब इस फ़ील्ड में करियर की शुरुआत की थी, तो उन्हें भी इन सारी समस्याओं से दो-चार होना पड़ा था. यहां तक कि उनके पिता मूलचंद देधिया ने भी ऐसा करने से रोका था. उनके पिता भी बॉलीवुड के सबसे फ़ेमस गैफ़र्स में से एक हैं.

हेतल को मर्दों के बीच काम करते हुए पुरुषवादी मानसिकता का सामना करना पड़ा. वो ये स्वीकार नहीं कर पाते थे कि एक महिला ऐसा कर सकती है. साथ ही उनके साथी हेतल को देखकर कहते थे, 'ये इसके बस की बात नहीं'. सेट्स पर लाइट लगाना सिर्फ़ इतना ही नहीं है कि कोई भी लाइट उठाई और उसे लगा दिया. आपको क्रिएटिव होना पड़ता है और ये ख्याल रखना होता है कि कौन-सी लाइट किस सिचुएशन में काम करेगी. वो जब अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर और बिना किसी डर के लाइट्स को बांधतीं और उठाती थीं, तो लोग उन्हें देखकर दंग रह जाते थे.

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गैफ़िंग मेहनत के साथ ही बहुत स्ट्रेसफुल वर्क है. कभी-कभी 18 घंटों तक काम करना पड़ता है. उस वक़्त उन्हें ऐसा महसूस होता था कि आखिर उन्होंने ये काम क्यों चूज़ किया, मगर उन्होंने कभी हार नहीं मानी और वो हिंदी सिने जगत की पहली महिला गैफ़र बन गई.

हेतल ने 'डॉन', 'लक बाय चांस', 'गुज़ारिश', जैसी हिंदी फ़िल्मों के साथ ही 'MI4: Ghost Protocol' और 'Eat Pray Love' जैसी हॉलीवुड फ़िल्मों में भी बतौर गैफ़र काम किया है. आज वो एंटरमेंट इंडस्ट्री में एक जाना-माना नाम हैं. फ़िलहाल वो बहुत कम ही फ़िल्मों में कार्य करती हैं, ताकि वो हॉलीवुड प्रोजक्ट्स पर ज़्यादा ध्यान दे सकें, क्योंकि वहां उन्हें अपने हुनर को और तराशने का मौका मिलता है.

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हेतल करीब एक दशक से इस इंडस्ट्री में कार्य कर रही हैं. उन्होंने जिस हौसले के साथ मंनोरंजन की दुनिया में अपना एक अलग मुकाम बनाया है, वो काबिल-ए-तारीफ़ है. बीबीसी को दिए अपने एक इंटरव्यू में हेतल ने कहा कि महिलाओं को इस फ़ील्ड में अपना करियर बनाना चाहिए. औरतें, मर्दों की तुलना में ज़्यादा क्रिएटिव होती हैं. साथ ही इससे समाज में महिलाओं के प्रति लोगों का रवैया भी चेंज होगा.

बहरहाल, हेतल ने ये साबित कर दिखाया है कि नारी अबला नहीं सबला है, वो जननी ही नहीं ज्वाला भी है. हेतल जैसी तमाम महिलाओं को हमारा सलाम.

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