38 साल के एक फ़ॉरेस्ट रेंज ऑफ़िसर हैं. लोग इन्हें 'वन सिंघम' के नाम से जानते हैं, लेकिन असली नाम संजय दत्त है. पश्चिम बंगाल के बेलाकोबा रेंज(जलपाईगुड़ी) में इन्होंने बीते 8 सालों में जो कुछ किया है, वो एसी कमरों में World Environment Day मनाने से कई गुना ज़्यादा सराहनीय और सम्माननीय है.

लाइम लाइट से दूर रहने वाले इस ऑफ़िसर का ऑफ़िस देखकर आपको गाड़ी के किसी बंद हो चुके गैराज जैसी फ़ीलिंग आ सकती है. ज़ब्त की गई महंगी गाड़ियां जिन पर ज़ंग और धूल जम चुकी है, सालों से ऑफ़िस के बाहर पड़ी हुई हैं. ये गाड़ियां इस क्षेत्र के लकड़ी चोरों और वन्य जीवों का अवैध धंधा करने वालों से ज़ब्त की गई हैं.

8 साल में 200 शिकारियों और 300 से ज़्यादा तस्करों को पकड़ा

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पश्चिम बंगाल के जंगलों में 8 साल पहले बाघ और तेंदुए की हड्डियां और खाल, गैंडे के सींग, हाथी दांत, दोमुहे सांप और उनका ज़हर, रंगीन छिपकलियों की तस्करी ज़ोरों पर थी. लेकिन पिछले 8 सालों में इस 'वन सिंघम' ने 200 शिकारियों और 300 से ज़्यादा चोरों को गिरफ़्तार किया. संजय अब पास के ही युवकों को भी फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट की मदद के लिए ट्रेनिंग देते हैं, जिससे जंगल से अवैध कारोबारियों का कारोबार पूरी तरह से ख़त्म किया जा सके.

जंगल के जानवर भी इनके एहसान को मानते हैं

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संजय शिकारियों, तस्करों और अवैध वन्य जीव व्यापारियों को पकड़ने वाली टीम के हेड हैं. इस पद की इनको क़ीमत भी चुकानी पड़ी. जंगल के जानवर भी दत्त के प्रयासों को समझते हैं और इनके प्यार का एहसान चुकाना चाहते हैं. एक बार दत्त को एक लकड़ी माफ़िया ने गोली मार दी, तो एक हाथी ने उस माफ़िया को कुचल दिया.

संजय ने एक बार तीस्ता नदी के पास गजोलडोबा बार रेंज में 3 लकड़ी तस्करों को पकड़ते हुए अपना एक साथी खो दिया, जिसकी लाश भी नहीं मिल सकी.

इन प्रयासों के लिए मिले कई सम्मान

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संजय के वन और वन्य जीवों के संरक्षण के प्रयासों को देखते हुए इन्हें 'क्लार्क आर. बावियन वन्यजीव कानून प्रवर्तन पुरुस्कार' से सम्मानित भी किया गया. इसके अलावा इसी साल इन्हें पश्चिम बंगाल सरकार ने 'बेस्ट वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन अवॉर्ड' से सम्मानित किया है. ये पुरुस्कार इन्हें लकड़ी चोरों, तस्करों और शिकारियों से जंगल को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए दिए गए.

संजय कहते हैं, 'उन्हें उनका काम और जंगल दोनों पसंद हैं, क्योंकि उनके पिता भी फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर रह चुके हैं और वो भी जंगल के लिए समर्पित थे.

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