साल 1992 में एक मल्टीस्टारर फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, नाम था परंपरा. यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में आमिर ख़ान, सुनील दत्त और विनोद खन्ना जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ एक चेहरा और नज़र आया था, जिसने फ़िल्म से डेब्यू किया था. आज की तारीख में ये एक्टर बॉलीवुड के टॉप एक्टर्स में से एक है. और इस अभिनेता का नाम सैफ़ अली खान है. नवाब पटौदी के सुपुत्र सैफ़ ने भी आज इस मुकाम पर पहुंचने के लिए कई उतार-चढ़ाव देखे हैं.

सैफ़ की पहली फ़िल्म परम्परा अपने टाइम की सुपर फ़्लॉप फ़िल्मों से एक थी और उस पर भी बड़े-बड़े कलाकारों के बीच सैफ़ पर तो किसी की नज़र ही नहीं पड़ी. उसके बाद उनकी पहला नशा (1993) और पहचान (1993) फ़िल्में रिलीज़ हुई. पर शायद इन फ़िल्मों के बारे में बहुत से लोग जानते भी नहीं होंगे.

फिर 1993 में ही उनकी और ममता कुलकर्णी की फ़िल्म आशिक आवारा रिलीज़ हुई और इसके लिए सैफ़ अली खान को फ़िल्म फ़ेयर का बेस्ट डेब्यू एक्टर का अवॉर्ड मिला. हालांकि, ये फ़िल्म भी बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पाई थी, लेकिन फ़िल्म का सैफ़ पर फ़िल्माया गया गाना 'मैं हूं आशिक, आशिक आवारा... सुपर हिट हुआ और इसने उनको एक पहचान दिलाई.

इसी साल उनकी ये दिल्लगी रिलीज़ हुई, जिसमें उनके साथ अक्षय कुमार और काजोल ने काम किया. अब बात अगर ये दिल्लगी की हुई है, तो उनके एक गाने की बात न हो, ये भला कैसे हो सकता है. जी हां, हम बात कर रहे हैं ओले-लोए गाने की. ये गाना इतना बड़ा सुपरहिट हुआ था, कि कोई पार्टी, कोई समारोह इसके बिना अधूरा था.

वैसे सैफ़ और अक्षय कुमार ने एक साथ कई फ़िल्मों में काम किया है. एक टाइम पर इनकी जोड़ी हिट हो गई थी. हालांकि, फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा पायीं थीं.

इसके बाद सैफ़ ने साल 1994 से लेकर 2000 तक करीब 19 फिल्मों में बतौर लीड रोल काम किया, लेकिन जो नाम और पहचान उनको इन सालों में मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली. इस टाइम पीरियड में उनकी जो फिल्में चली थीं, 'मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी', 'दिल तेरा दीवाना', 'तू चोर मैं सिपाही', 'हम साथ साथ हैं', 'बीवी नम्बर वन', 'हमसे बढ़कर कौन', 'क्या कहना', 'कच्चे धागे' आदि के नाम शामिल हैं.

मगर 2001 में एक फ़िल्म ने उनको दर्शकों के सामने बतौर हीरो पेश किया और वो थी आर. माधवन और दीया मिर्ज़ा स्टारर 'रहना है तेरे दिल में'. हालांकि इसमें उनका लीड रोल नहीं था, लेकिन इस रोल में उन्होंने अपने अभिनय, पर्सनालिटी, और स्मार्टनेस से जान डाल दी. मगर ये भी इनके फ़िल्मी करियर के लिए टर्निंग पॉइंट साबित नहीं हो पायी.

पर वो कहते हैं न कि कड़ी मेहनत और संघर्ष कभी न कभी तो सामने आता ही है, और ये मौक़ा उनको मिला 2001 में रिलीज़ हुई फ़िल्म दिल चाहता है ने. जी हां, आमिर खान, फरहान अख्तर और प्रीटी ज़िंटा स्टारर फ़िल्म दिल चाहता है, सैफ के फ़िल्मी सफ़र में मील का पत्थर साबित हुई.

'दिल चाहता है' के बाद सैफ़ को 'कल हो न हो', 'डरना मना है', 'लव के लिए कुछ भी करेगा', 'एलओसी कारगिल' जैसी फ़िल्मों में काम करने का मौक़ा मिला. इसके बाद सैफ़ ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

और शुरू हुआ उनकी सुपर हिट फ़िल्मों का 'सिलसिला', जैसे 'हम तुम', 'परिनीता', 'बीइंग साइरस', 'सलाम नमस्ते' और 'ओंकारा'. परिनीता में जिस संजीदगी से सैफ़ ने अपना किरदार निभाया था, उसको कोई भूल नहीं सकता. जब-जब परिनीता का ज़िक्र होगा सैफ़ का नाम खुद-ब-ख़ुद सामने आ जाएगा.

और 'ओंकारा'

ओंकारा एक ऐसी फ़िल्म जिसमें अजय देवगन जैसे संजीदा अभिनता थे, के सामने सैफ़ ने अपने किरदार को ऐसे निभाया कि लोगों के लिए ओंकारा मतलब सैफ़ अली खान हो गया. फ़िल्म में उनका ज़बरदस्त अभिनय देख कर ऐसा लगता मानो लंगड़ा त्यागी का रोल उनके अलावा कोई और कर ही नहीं सकता था.

इस किरदार के लिए सैफ को फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ ख़लनायक का अवॉर्ड भी मिला. इसके अलावा उनको दिल चाहता है लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया.

पिछले कुछ सालों में सैफ ने 'लव आज कल', 'कॉकटेल', 'रेस-2', 'गो गोवा गौन', 'फ़ैंटम' जैसी फिल्मों से साबित कर दिया कि वो एक एक्शन और रोमांटिक हीरो के रोल को भी बखूबी निभा सकते हैं.

और शायद यही वजह है कि उनकी वर्स्टेलिटी को देखते हुए उनको 'सेक्रेड गेम्स' वेब सीरीज़ के लिए चुना गया.

इस सीरीज़ में वो एक सरदार, जो एक पुलिस ऑफ़िसर है की भूमिका निभा रहे हैं, जिसकी हर कोई तारीफ़ कर रहा है.

सैफ़ अली खान एक ऐसे एक्टर हैं, जो 4-5 साल में एक फ़िल्म ऐसी करते हैं, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके काम और अभिनय के लिए जानी जाती है.

वही सैफ़ 2018 में बाज़ार में एक ऐसी बिज़नेसमैन के किरदार में नज़र आये जो स्टॉक मार्केट का बेताज बादशाह है. इसके अलावा इसी साल में उन्होंने 'शेफ़' और 'कालाकांदी' जैसी मूवीज़ में भी काम किया. 2019 में लाल कप्तान उनकी फ़िल्म रिलीज़ हुई थी. फ़िल्म को भले ही कुछ ख़ास सफ़लता नहीं मिली लेकिन सैफ़ की एक्टिंग की ख़ूब तारीफ़ हुई.

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और अगर बात करें 2020 की तो इस साल सैफ़ ये 'जवानी है दीवानी' 'बंटी और बबली 2', और 'दिल बेचारा' में नज़र आये. वही 2020 में रिलीज़ हुई 'तानाजी: द अनसंग वॉरियर' में उनके उदयभान सिंह राठौर के किरदार ने ख़ूब वाहवाही लूटी.

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उन्होंने 2001 में दिल चाहता है की, फिर 2004 में हम तुम, 2006 में ओंकारा, 2012 में कॉकटेल, 2015 में 'फ़ैंटम' और 2018 में 'सेक्रेड गेम्स' और बाज़ार, 2019 में लाल कप्तान और 2020 में 'तानाजी: द अनसंग वॉरियर' और इन सालों की हर फ़िल्म में उनका हर स्टाइल और किरदार अलग है.