सुशीला चानू किसी भी 25 साल की आम लड़की की तरह ही है. वह आज़ाद ख्यालों की है, अपने आने वाले भविष्य को लेकर उत्साही है. वो अपनी नौकरी पूरी ईमानदारी से करती है और अपने खेल से भी उसे बहुत प्यार है. सुशीला रियो ओलंपिक में जाने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम के कप्तान के तौर पर गई थी. सुशीला जब खेल के मैदान में गोल नहीं कर रही होती है, तो उस समय मुम्बई रेलवे में टिकट कलेक्टर के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी निभा रही होती हैं.

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30 सितम्बर को भारतीय वन डे क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जीवनी पर बनी फ़िल्म 'MS Dhoni: The Untold Story' रिलीज़ होने वाली है. इस फ़िल्म में धोनी के बारे में बताया गया है कि किस तरह अपने करियर की शुरुआत में उन्हें अपने खेल पर भी ध्यान देना होता था और रेलवे की नौकरी को भी सम्भालना होता था. अपने खेल में सुधार लाने के लिए उन्होंने रेलवे की नौकरी को अलविदा कह दिया था. आगे चल कर धोनी ने क्रिकेट की दुनिया में जो नाम कमाया है, उससे हम सभी वाकिफ़ है.

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सुशीला सबसे पहले सुर्ख़ियों में तब आई थी, जब उन्होंने जूनियर नेशनल महिला टीम को जर्मनी में 2013 में हुए जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में ब्रोंज मेडल दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

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सीनियर नेशनल टीम में आने के बाद सुशीला भारतीय क्षेत्ररक्षण की जान बन गई. पिछले साल हुए हॉकी वर्ल्ड लीग टूर्नामेंट में टीम को सेमीफाइनल तक पहुंचाने में सुशीला ने काफ़ी मेहनत की थी. ऑस्ट्रेलिया में हुए चार देशों के टूर्नामेंट में भी इस युवा खिलाड़ी ने टीम की अगुवाई की थी.

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इस तूफानी करियर की गति में ब्रेक तब लगा, जब सुशीला को घुटने में लगी चोट की वजह से सर्जरी करवानी पड़ी. लेकिन सुशीला कहां रुकने वाली थी, कड़ी मेहनत और लगन के बल पर केवल 8 सप्ताह के ब्रेक के बाद ही वो फिर से मैदान में ट्रेनिंग के लिए लौट आई.

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सुशीला के कड़े संघर्ष के बल पर ही हमारी महिला हॉकी टीम 36 साल बाद रियो ओलंपिक में क्वालीफाई कर पाई. अपनी कप्तानी में वह टीम को पूरे जुनून के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करती रही. कड़ी मेहनत के बावजूद टीम Quarterfinal में जगह नहीं बना पाई.

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सुशीला का जन्म साल 1992 में मणिपुर के इम्फाल में हुआ था. उनके पिता एक ड्राइवर हैं और माता एक गृहिणी. सुशीला ने 11 साल की उम्र में ही हॉकी स्टिक उठा ली थी. हॉकी के खेल के शुरुआती दौर में उनके अंकल ने उनकी काफ़ी मदद की. खेल की तरफ़ उनका पूर्ण समर्पण 1999 से ही शुरू हो गया था, जब सुशीला ने नेशनल गेम्स में एक फुटबाल का मैच देखा था.

सुशीला अपनी लाइफ में निभाती हैं दो किरदार

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सुशीला का हाल ही में प्रमोशन हुआ है, अब वह सीनियर टिकट कलेक्टर बन गई हैं. यह रेलवे की नौकरी ही उनकी आमदनी का एकमात्र साधन है. सुशीला को तनख्वाह के तौर पर केवल 26,000 रुपये मिलते हैं. लेकिन उन्हें किसी महीने ट्रेनिंग के लिए छुट्टी लेनी पड़ी, तो उनकी सैलेरी से पैसे कट जाते हैं. सुशीला को इस बात की कोई शिकायत नहीं है कि उनके पैसे काट लिए जाते हैं, वो केवल अपने गेम पर ध्यान देना चाहती हैं.

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जब उनसे पूछा गया कि नौकरी के दौरान आप किसी यात्री को बिना टिकट के पकड़ती हैं, तो कैसी सिचुएशन का सामना करना पड़ता है. जवाब में सुशीला ने कहा कि 'यात्री मुझसे रिक्वेस्ट करने लगते हैं कि मैं उन्हें छोड़ दूं. कुछ लोग तो रोने और गिड़गिड़ाने भी लगते हैं. मुझे ये काम बहुत ज़्यादा पसन्द नहीं है लेकिन अपने खर्चों को चलाने के लिए मेरे पास और कोई दूसरा साधन भी नहीं है, इसलिए मुझे इसे करना पड़ता है.

हमारे देश में आज भी क्रिकेट और बाकी खेलों में काफ़ी भेदभाव किया जाता है. जहां क्रिकेट में काफ़ी स्पॉन्सर्स और पैसा है, वहीं दूसरे खेलों की माली हालत काफ़ी खस्ता है. सुशीला भी अपने खेल पर पूरी तरह ध्यान देना चाहती है लेकिन आर्थिक मजबूरी के चलते, वह अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकती हैं. इसी बात को देख लीजिए कि आज सुशीला खबरों में भी इसलिए हैं क्योंकि क्रिकेट के कप्तान पर फ़िल्म आ रही है, जो कभी ख़ुद टिकट कलेक्टर रहे थे.

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