बेहद विनम्र स्वभाव के गुरमीत सिंह, जिनकी पटना शहर में चिड़इयांटाल इलाके में कपड़े की दुकान है. पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती कुछ लवारिस मरीज़ों के लिए फ़रिश्ते जैसे हैं.

प्रतिदिन गुरमीत सिंह रात के नौ बजे अस्पताल के 'लवारिस' वॉर्ड में जाते हैं. उनके हाथ में कुछ खाने का सामान, कुछ मिठाइयां और कभी-कभी अंडे भी होते हैं. ये सभी खाद्य सामग्री वो वॉर्ड के मरीज़ों में बांट देते हैं, सबकी तबियत के बारे में पूछते हैं. बरतनों को ख़ुद धोते हैं और वापस अपने घर चले जाते हैं. ऐसा वो पिछले 26 सालों से कर रहे हैं.

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अगर किसी मरीज़ को डॉक्टर की ज़रूरत होती है, तो वो भाग कर डाक्टर से संपर्क भी करते हैं.

The New Indian Express से हुई बातचीत में उन्होंने एक वाकये का ज़िक्र किया, 'मुझे डॉक्टरों को एक महिला मरीज़ के बारे में बताना था, शायद उसका हाथ टूट गया था. ये मरीज़ अक्सर राते में अपने बेड से गिर जाते हैं, जिससे इन्हें फ्रेक्चर हो जाता है.'

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कभी-कभी गुरमीत सिंह मरीज़ों की पर्ची लेकर दवाईयों के नाम लिख लेते हैं, जिन्हें वो बाद में ख़रीदते हैं.कई मौकों पर गुरमीत मरीज़ों के लिए रक्तदान भी कर चुके हैं.

'अब डॉक्टर ने मुझे कह दिया है कि मैं और रक्तदान नहीं कर सकता. मेरी सेहत पर बुरा असर पड़ेगा, इसलिए आपतकालीन स्थिति में मेरा बेटा और कुछ रिश्तेदार रक्तदान करते हैं.'

वॉर्ड में कुछ मरीज़ ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए गुरमीत सिंह का दिया खाना ही उनके दिन का पहला खाना होता है. एक राष्ट्रीय अख़बार से बात करते हुए एक मरीज़ ने कहा, 'अगर सरदार जी हर रोज़ खाना और दवाईयां लेकर न आएं, तो हम मर ही जाएंगे.'

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निस्वार्थ सेवा भाव की जा रही गुरमीत सिंह की इस सेवा को इंग्लैंड की एक सिख संगठन ने नोटिस किया और उन्हें वर्ल्ड सिख अवॉर्ड दिया. उनके काम को देखते हुए दो अन्य व्यक्ति प्रोत्साहित हुए और वो भी मरीज़ों के लिए खाना ले कर अस्पताल जाने लगे.

गुरमीत ये काम सिख धर्म की महत्वपूर्ण रीति 'दसवंद' को पालन करने के लिए करते हैं. इसके अनुसार, सिखों के अपनी कमाई का दसवां हिस्सा सेवा कार्य में लगाना होता है.

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