भड़ाम!

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रात को आंखें फाड़-फाड़ कर फ़ोन पर बेमतलब की चीज़ें पढ़ रही थी, तभी फ़ोन ज़ोर से गिर गया... सीधे मेरे मुंह पर. एक तो आजकल ये कवर इतने भारी होते हैं कि नहीं भी लगनी हो, तो चोट लग जाती है. ख़ैर, मैं एक ढीठ सोशल मीडिया फ़्रीक जेनरेशन का हिस्सा हूं, इसलिए फिर से सोशल मीडिया पर टहलने लगी.

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स्मार्टफोन्स के साथ-साथ इन्टरनेट का चस्का इतना ज़बरदस्त है कि आदमी खाते-पीते-सोते-जागते, सब कुछ करते हुए अपना फोन नहीं छोड़ता. ये लड़की होने के नाते कह रही हूं कि शॉपिंग करते वक़्त बेकार-सी दिखने वाली वो कुर्ती इसलिए खरीद लेती हूं क्योंकि उसमें पॉकेट होती है.

हम उस भीड़ का हिस्सा बन गए हैं, जो मर भी रही होगी, तो भी यमराज के साथ Selfie अपडेट करके ऊपर जाएगी.

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मार्किट में रोज़ नयी स्टडीज आती हैं, फ़ोन को बगल में रख कर सोने से नुकसान, ज़्यादा देर फ़ोन यूज़ करना ग़लत है. वो बेचारे इसलिए रिसर्च करते हैं कि हम थोड़ा डर जाएं, लेकिन भैया हम पता नही कौन-सी कसम खा के पैदा हुए हैं कि रात को सोने से पहले और सुबह उठते ही दो गोली इन्टरनेट तो चाहिए ही.

अभी जो स्टडी आयी है, वो कहती है कि आजकल वो लोग भी देर रात जगे रहते हैं, जिनको पढ़ाई नहीं करनी होती. स्कूल, कॉलेज के स्टूडेंट्स इसलिए देर रात उठे रहते हैं क्योंकि उनको पढ़ना होता है, लेकिन अपन लोग कौन सा पहाड़ तोड़ने के लिए उठे रहते हैं, ये रिसर्च वाले भाई की समझ में नहीं आया. वो बोल रहा है कि लोग जब पढ़ नहीं रहे, तो वो इतनी देर रात तक उठे क्यों रहते हैं?

भाई ने जितनी मासूमियत में ये सवाल किया है, उतने ही डेडली (खतरनाक पढ़ें) तरीके से हम लोग इसका जवाब दे रहे है. जनाब बात ये है कि हम हैं Loners, यानि वो प्रजाति जिसे अपने लिए स्पेस चाहिए. हास्यास्पद ये है कि हम ये जो अपने लिए क्वालिटी टाइम निकाल रहे हैं, वो सोशल मीडिया पर निकलता है. दोस्तों से बातें करते हुए कटता है. इन शॉर्ट, हम अपने क्वालिटी टाइम में बुक पढ़ना नहीं, हाथ में फ़ोन लेकर, उसे स्करॉल करना बेहतर समझते हैं.

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मुझे तो तेरी लत लग गयी

ये लत ऐसी है कि इसकी आदत पड़ने पर आपको लगता है कि इसके बिना जिया नहीं जा सकता. ये मेरा अपना ऑब्ज़र्वेशन है कि आज से 3 साल पहले तक अगर मुझे नींद नहीं आती थी तो मैं कैसे भी सोने की कोशिश करती थी, लेकिन मेरा हाथ तकिये के नीचे रखे अपने फ़ोन पर कभी नहीं जाता था. पर अब जब भी मुझे नींद नहीं आती, या तो मैं किसी शो के एक सीज़न के सारे एपिसोड ख़त्म कर देती हूं, या फिर उस वक़्त Online रहे किसी जंतु से चैट करने लगती हूं. शायद, मैं यहां अपनी इस पूरी जेनरेशन का प्रतिनिधित्व कर रही हूं.

कंट्रोल नी हूंदा

फ़ोन के बिना हम नहीं रह सकते, ये सच्चाई है. एक तरह से देखें तो ये हमारी ज़रूरत भी है, क्योंकि बहुत से लोग हैं जिनका काम ही फ़ोन पर होता है. लेकिन इस फ़ोन का कितना और कैसे इस्तेमाल करना है, ये हमारी चॉइस है. इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का जिस तरह से इस्तेमाल करो, वो हमारी स्लीप पर असर डालता है. आजकल आधे लोगों को नींद की प्रॉब्लम सिर्फ़ इसी वजह से हो रही है.

मोबाइल लाइफस्टाइल का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे लाइफ बनाना गलती है. और बेहतर हो कि हम इसे जल्दी समझ लें.

Research Source: JAMA Pediatrics

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