सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से...

एक रोज़ तुम्हें मांग के देखेंगे ख़ुदा से

राणा अकबराबादी की लिखी हुई ये नज़्म उस दिन अमर हो गई थी, जब इसे ग़ज़ल सरताज जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज़ में गाया था.

उर्दू और ग़ज़ल शाही महफ़िलों के ऐसे दो ख़ज़ाने थे, जिन्हें उनके रसूखदार चाहने वालों तक आराम से पहुंचाया जा रहा था. लेकिन उसे एक आम रसिक तक पहुंचाने वाली आवाज़ थी जगमोहन सिंह, जगजीत सिंह की. दिल के लिए मरहम का काम करने वाली उनकी गायकी से पहले भारत के पास अच्छे गायक तो थे, लेकिन ग़ज़ल के मामले में मेहंदी हसन और ग़ुलाम अली को टक्कर देने वाला कोई नहीं. जगजीत सिंह वो नाम थे.

उनका गाना और वाह-वाही का दौर

उनकी पत्नी चित्रा ने राज्य सभा टीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि जगजीत साहब के पास बाजा (हारमोनियम) अगर आ जाए, तो मजाल वो किसी के पास चला जाये. उन्हें अपने बाजे से बहुत प्यार था, उसे लेकर वो घंटों रियाज़ करते थे और उनकी सोहबत में कभी उनकी बहन, तो कभी चित्रा बैठ कर सीखते रहते.

70 के दशक में धीरे-धीरे जब उन्हें कॉन्सर्ट और शो मिलने शुरु हुए, तो लोग ऐसे दीवाने हुए कि उसके बाद विदेशों में उनका कोई भी कॉन्सर्ट हॉउसफुल रहे बिना नहीं गया.

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Jingle Queen चित्रा और ग़ज़ल Maestro जगजीत की हिट जोड़ी

70 से लेकर 90 के दशक में जगजीत सिंह और चित्रा की जोड़ी ने लगातार कई हिट एलबम्स दी. ये सिलसिला थमा, जब 90 में उनके 18 साल के लड़के विवेक की रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई. कभी रियाज़ किये बिना न रहने वाले जगजीत ने साल भर कुछ नहीं गाया. चित्रा इस सदमे से कभी नहीं उबर पाईं और उसके बाद उन्होंने गाना छोड़ दिया. जगजीत साहब ने साल भर बाद दोबारा स्टेज पर वापसी की, उनकी कई एलबम्स हिट हुईं लेकिन उनके गाने में एक अजीब सी मायूसी आ गई थी. उनके सुरों में कभी न भर पाने वाला दर्द था.

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उनके फैंस ने ये बात ज़रूर महसूस की होगी कि 90s से पहले गाये उनके सभी गानों में उनकी आवाज़ लाइट और मुस्कान भरी लगती थी, लेकिन उसके बाद से उसमें एक अजीब-सा भारीपन आ गया था.

चाहे वो मिर्ज़ा ग़ालिब के लिए गाया, 'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी हों ' या फिर सरफ़रोश के लिए 'होश वालों को खबर क्या ' हो.

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चित्रा के बिना जगजीत सिंह अकेले हो गए, लगता था बाकी साज़ अलग हैं और वो अलग दुनिया में हैं. लेकिन उस ग़म-ऐ-दौर में भी उन्होंने कुछ बेहतरीन नग्में हमें दिए.

जगजीत सिंह की ग़ज़लों की कैसेट

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कुछ तो बात थी इन ग़ज़लों में, कि एक बार Play का बटन दबाने भर से थकान और परेशानियां सिरहाने से सरक कर खिड़की से बाहर चली जाती थीं.

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उनकी ग़ज़ल शैली से अलग एक पंजाबी टप्पा आपसे शेयर कर रही हूं. इसे उन्होंने एक महफ़िल में चित्रा जी के साथ गाया था, ये आज भी मेरे Jagjit Singh Favorites में से एक है:

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