दिल्ली में ऑटो चालक रामजी कहते हैं कि ये शहर अब रहने लायक नहीं रह गया . बेरोजगारी दूर करने के लिए इस शहर में आया था. आज कई बीमारियों से ग्रस्त हूं. जितना इस शहर ने नहीं दिया, उससे कहीं ज़्यादा छीन लिया.

ये कहानी सिर्फ़ रामजी की ही नहीं है. न जाने कितने ऐसे रामजी होंगे, जो इस तरह की समस्या से ग्रस्त हैं. वर्तमान में प्रदूषण के कारण दिल्ली की स्थिति काफ़ी भयावह हो चुकी है. देखने से पता चलता है कि राजधानी में आपातकाल की स्थिति आ गई है. वो भी प्रदूषण की वजह से. दिवाली में पटाखे और आस-पास के राज्यों में जलाए गए फसलों के अवशेषों से उठे धुएं के कारण धुंध काफ़ी बढ़ चुका है. इसमें कई रासायनिक और ज़हरीली गैसों का मिश्रण है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. उदाहरण के लिए आपको बताता हूं कि दिन में आप करीब 30 सिगरेट पी रहे हैं.

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सुप्रीम कोर्ट न इस मसले पर केंद्र, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों को काफ़ी फटकार लगाई है. National Green Tribunal ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि इस मामले में दखल दें. राजनीतिक शब्दावली में इसे Judicial Activism कहते हैं. यानि जब सरकार काम नहीं करती है, तो सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी कर, सरकार को उसके काम के बारे में याद दिलाती है.

कुछ महीने पहले भोपाल, चेन्नई, बिहार के उत्तरी क्षेत्र तथा आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति बन गई थी. लोगों के घरों में जलभराव हो गया था. काफ़ी मशक्कत के बाद स्थिति को काबू में लाया गया. अभी हाल में ही दिल्ली से सटे गुड़गांव में पानी के कारण भयंकर जाम लग गया था. इस जाम का सामना अमेरिका के विशिष्ट अधिकारी को भी करना पड़ा.

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गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी और गोदावरी जैसी बड़ी नदियां, इन दिनों प्रदूषण से त्रस्त हैं. सरकार, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और संबंधित अधिकारी इस पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं. नदियां नाला बन रही हैं और हम बस तमाशा देख रहे हैं. एक दिन ऐसा आएगा, जब हम तमाशा ही बनकर रह जाएंगे.

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हो सकता है कि ये आपको महज़ एक आर्टिकल लगे, मगर मैं आपसे सवाल पूछ रहा हूं, जिसका जवाब ही सिर्फ़ इसका समाधान है. ऐसा नहीं है कि सरकार और प्रशासन को इन सब बातों की जानकारी नहीं है. जानकारी होते हुए भी सरकार उसे अनदेखा कर रही है. कोसी में हर साल बाढ़ आती है, जिसमें लाखों ज़िंदगियां बर्बाद हो जाती हैं. इसके अलावा फसलें भी बर्बाद होती हैं. लेकिन राज्य सरकार कुछ करने से कतराती है. सिर्फ़ केंद्र से स्पेशल पैकेज की मांग करती है. अब यहां पर सबसे अहम सवाल, क्या सरकार सिर्फ़ स्पेशल पैकेज की मांग के लिए बनी हुई है, या इसका कोई स्थाई समाधान भी निकालेगी?

देश में कई संस्थाएं हैं, जिन्हें आर्थिक नुकसान के बारे में पहले से जानकारी होती है. हमारे यहां तो सरकारें भी विदेशी फंड के लिए ललायित रहती हैं.

शहरों का विस्तार, मगर विनाश के राह पर

सरकारी योजनाओं पर ग़ौर करें, तो पाएंगे कि इन दिनों स्मार्ट सिटीज़ बनाने का प्रचलन ख़ूब ज़ोरों पर चल रहा है. लेकिन दिक्कत ये है कि समावेशी विकास के बिना स्मार्ट सिटी कैसे बने? जंगलों को काटकर, सूखी नदियों, तालाबों और पोखरों के ऊपर मिट्टी भरकर, भला कौन सी सिटी 'स्मार्ट' लगेगी?

नालियों की निकास की व्यवस्था नगण्य है

बारिश हुई नहीं कि शहर जलमग्न हो जाता है. जानते हैं इसके पीछे बड़ी वजह क्या है, निकास की सुविधा न होना. भोपाल, रायपुर, पटना, चेन्नई, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में नालियों के निकास की कोई सुविधा नहीं है.

पानी को स्वच्छ करने की व्यवस्था नहीं

कारखानों से निकले ज़हरीले तत्व सीधे नदियों में मिल जाते हैं. इस वजह से हमें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ख़तरनाक औद्योगिक प्रक्रियाओं से बढ़ते ख़तरे पर सरकार चुप्पी साधे हुए है.

यूं तो प्रदूषण और उसके कारकों पर बात की जाए तो कई किताबों की सीरीज़ बन सकती है, मगर मुद्दा ये है कि सरकार इन मुद्दों पर चुप क्यों है?