बड़े-बड़े सेट, Larger Than Life स्टार्स, ढेर सारा ड्रामा, इमोशंस का कॉकटेल और उमड़ता हुआ ग्लैमर. दुनिया भर में हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता का ये पैमाना शोमैन राज कपूर के समय से शुरू हुआ था और आज भी इसकी ये पहचान धुंधली नहीं हुई है. हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी और मज़बूत कड़ी है उसका हीरो. हमारी ज़्यादातर फ़िल्में हीरो के इर्द-गिर्द घूमती हैं. हमारा हीरो कई गुंडों से लड़ता है, हीरोइन की रक्षा करता है. उसकी लड़ाई विलेन से होते-होते एलियंस तक पहुंच जाती है और वो फिर भी जीत जाता है, क्योंकि वो एक हीरो है. सालों से हीरो को इसी अंदाज़ में दिखाया जाता रहा है. हालांकि बीच-बीच में Superhero से हट कर एक ऐसा अपवाद भी आता है, जिससे जनता ख़ुद को जोड़ पाती है. ये हीरो अजीब से दिखने वाले विलेन्स से भले न लड़े, अपनी मुसीबतों, अपने हालातों से ज़रूर लड़ता है. 

वो हीरो था 70s का अमोल पालेकर

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अमोल पालेकर को दुनिया 'गोलमाल' के रामप्रसाद के नाम से जानती है. जब हीरो की Definition सिर्फ़ उसकी बॉडी और लुक्स थी, तब एक ऐसा हीरो भी था, जिसने न तो गुंडों से लड़ाई की, न ही हीरोइन के साथ उछल-उछल कर डांस किया, फिर भी वो एक आम दर्शक का हीरो बना. वजह थी उसकी सादगी, उसकी सरलता और उसका 'आम-सा' होना.

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हम भले ही फ़िल्मों को ख्व़ाब समझते हों, लेकिन फ़िल्में इसी समाज का आईना हैं. एक आम आदमी थिएटर की उस कुर्सी पर बैठ कर ख़ुद को वो हीरो समझता है. और जब वो देखता है कि उस हीरो की ज़िन्दगी में हूबहू वही परेशानियां, वही मुद्दे हैं, तो उसका जुड़ाव उस हीरो की तरफ़ और बढ़ता है.

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अमोल पालेकर की सरलता ही उन्हें ये Status देती है. चाहे वो उनकी फ़िल्म 'गोलमाल' हो, या फिर 'चित्तचोर, उसमें कहीं भी 'हीरो' नहीं दिखा. अमोल पालेकर इस किस्म के रोल जिन फ़िल्मों में कर रहे थे, वो फ़िल्मों उस दौर में बन रही थी, जब मनमोहन देसाई और शक्ति सामंत एंग्री यंग मैन की झलक दिखा रहे थे. स्टार बनने के बाद किसी भी एक्टर के लिए 'आम इंसान' प्ले करना बेहद मुश्किल होता है. ये उस दौर की बात है, जब ग्लैमरस रोल्स की शुरुआत हुई ही थी. अमोल पालेकर के लिए ऐसा करना इसलिए भी आसान था क्योंकि वो असल ज़िन्दगी में भी ऐसे ही थे. लोगों ने कभी किसी स्टार को मुंबई लोकल में सफ़र करते हुए नहीं देखा था, न ही उन्होंने एक स्टार को सहजता से बात करते हुए सुना था. ये उनके लिए बिलकुल नया था.

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अमोल पालेकर की इस छवि का ज़्यादा श्रेय उनके डायरेक्टर हृषिकेश मुख़र्जी को भी जाता है, हृषिकेश मुख़र्जी ज़िन्दगी से जुड़ी फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक थे. उनकी फ़िल्मों में काम करते हुए कोई भी हीरो, 'स्टार' न रह कर आम इंसान बन जाता था. चाहे वो धर्मेन्द्र और अमिताभ बच्चन ही क्यों न हों, हृषिकेश मुख़र्जी ने 'चोरी-चोरी' में उन्हें एक नया रूप दिया था. 'गोलमाल', 'नरम गरम' में अमोल के किरदार को अच्छे से सींचने वाले हृषिकेश मुख़र्जी ही थे.

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हम ख़ुशनसीब हैं कि आज के समय में हर तरह का सिनेमा देख पा रहे हैं. आज अगर शाहरुख़ जैसे स्टार हैं, तो राजकुमार जैसे अमोल पालेकर भी, जो एक आम इंसान को हीरो बना कर उसकी कहानी को पर्दे पर जीने की कोशिश करते हैं. 

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