सनातन धर्म सबसे पुराना धर्म होने के साथ-साथ सबसे ज़्यादा व्यवहारिक सिद्धांतों वाला धर्म भी है. इस धर्म को आध्यात्म के साथ-साथ प्रकृति के भी काफ़ी नजदीक माना जाता है. ब्रह्म को सर्वोच्च मानने वाले इस धर्म में दायित्वों और काल क्रम के अनुसार अनेक देवी-देवता हैं, इन देवी-देवताओं को अनेक गणों में बांटा गया है.

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इन सभी देवी-देवताओं को आध्यात्मिक और व्यवहारिक कारणों के साथ-साथ वैज्ञानिक कारणों से हमारे ऋषि-मुनियों ने वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों से जोड़ा है.

इस प्रकार प्रकृति और उसके जीवों की रक्षा का एक अनिवार्य संदेश भी समाज में प्रेषित किया गया. पशु-पक्षियों को किसी न किसी भगवान के प्रतिनिधि से जोड़ना, उनके खिलाफ़ हिंसा से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच की भांति है.

1. भगवान विष्णु का वाहन गरुड़

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भगवान विष्णु के इस वाहन को पक्षियों की बुद्धिमान प्रजातियों में से एक माना जाता है. प्राचीन काल में गरुड़ का प्रयोग संदेशों के आदान-प्रदान में भी किया करते थे.

शास्त्रों के अनुसार प्रजापति कश्यप की धर्मपत्नी विनता के दो पुत्र हुए. एक था गरुड़ और दूसरा अरुण. अरुण आगे चल कर सूर्य भगवान के सारथी बने और गरुड़ भगवान विष्णु की सेवा के लिए उनके पास चले गये.

गरुड़ों में सबसे ख्याति प्राप्त हुए, जटायु. जटायु अरुण के पुत्र थे. छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मन्दिर भी है. यहीं पर जटायु और रावण के बीच युद्ध हुआ था.

2. धन की देवी मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू

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कुछ लोग जिन्हें पता न हो,वो ये सोचते होंगे कि उल्लू से तात्पर्य तो मूर्ख से होता है, फिर इसे मां लक्ष्मी से कैसे जोड़ा गया. हम आपको बता दें, उल्लू निशाचरी प्राणियों में सबसे ज़्यादा बुद्धिमान होता है. उल्लू की ख़ासियत होती है कि इसे आने वाले भविष्य के बारे में पूर्वानुमान हो जाता है.

सनातन धर्म में उल्लू को धन सम्पदा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. तांत्रिक क्रियाओं में इस पक्षी का काफ़ी ज़्यादा प्रयोग होने से काफ़ी लोग इससे डरते भी हैं.

उल्लू जब उड़ता है, तो इसके पंखों से कोई आवाज़ नहीं निकलती है. इसकी नज़रें भी काफ़ी तेज़ होती हैं. उल्लू अपनी गर्दन को लगभग 170 डिग्री तक घुमा सकता है.

3. मां सरस्वती ने चुना है हंस को

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सरस्वती को ज्ञान को देवी कहा जाता है. ज्ञान से प्राणी के जीवन में पवित्रता, प्रेम और नैतिकता का आगमन होता है. इन सभी गुणों को का मिश्रण हंस में भी देखने को मिलता है.

हंस को काफ़ी समझदार और जिज्ञासु प्रवृत्ति का माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत तो यह है कि यह जीवनपर्यन्त एक ही हंसिनी के साथ रहता है. इसके ज्ञानी होने की वजह से शास्त्रों में कहा भी गया है, जो ज्ञानी है वो हंस हैं और जो कैवल्य को प्राप्त कर लेते हैं, वो परमहंस कहलाते हैं.

4. शिव की सवारी उनके प्यारे नंदी (बैल)

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नंदी महादेव के सभी गणों में उन्हें सबसे ज़्यादा प्रिय है. जिस तरह शास्त्रों में कामधेनु को श्रेष्ठ माना जाता है, उसी तरह नंदी को भी श्रेष्ठ माना जाता है.

बैल स्वभाव से काफ़ी शान्त होता है, लेकिन जब इसे क्रोध आता है, तो यह शेर से भी भीड़ जाता है. महादेव का स्वभाव भी कुछ इसी तरह का है. बैल को भौतिक इच्छाओं से दूर रहने वाला प्राणी माना जाता है.

5. माता पार्वती को पसंद है, बाघ की सवारी

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बाघ साहस और शौर्य का प्रतीक है. माता पार्वती एक बार जंगल में तपस्या करने गई थी, वहां एक बाघ उन्हें खाने के लिए आया. लेकिन मां पार्वती को देख कर वो भी उनके पास बैठ गया. सालों तक चली माता पार्वती की तपस्या के दौरान वो बाघ भी वहीं बैठा रहा.

जब मां पार्वती तपस्या पूर्ण करके उठी तो उन्हें इस बात का पता चला. बाघ की इस श्रद्धा से ख़ुश होकर उन्होंने इसे अपना वाहन बना लिया.

6. गणेश जी को आता है मूषक की सवारी में मज़ा

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मूषक शब्द संस्कृत भाषा के मूष से बना है, जिसका मतलब होता है चुराना या लूटना. यह लक्षण स्वार्थी होने का परिचायक है. भगवान गणेश का मूषक पर बैठना यह दर्शाता है कि उन्होंने स्वार्थ और लालच पर विजय हासिल कर ली है. इसके पश्चात उन्होंने मानव कल्याण और परोपकार का रास्ता चुना है.

7. शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन है मयूर

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भगवान कार्तिकेय को दक्षिण भारत में अधिक माना जाता है. मयूर का मन काफ़ी चंचल प्रकृति का होता है. उसे नियन्त्रण में रखना काफ़ी मशक्कतों भरा कृत्य है. कर्तिकेय की छवि एक साधक की तरह है, जिसने अपने मन को साध रखा है.

8. इंद्र का वाहन है, ऐरावत हाथी

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देवताओं और राक्षसों ने मिल कर जब समुद्र मंथन किया था, तो अमृत कलश के साथ 14 तरह के रत्न भी निकले थे. उन्हीं में से एक था, ऐरावत.

हाथी को स्वभाव से शान्त और बुद्धिमान माना जाता है. इन्हीं विशेषताओं को देख कर राजा इंद्र ने इसे चुना.

9. मौत के ठेकेदार यमराज का वाहन है भैंसा

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भैंसें का रूप देखने में काफ़ी भयानक लगता है, उसी तरह यमराज को भी काफ़ी भयानक समझा जाता है. भैंसें को एकता का प्रतीक भी माना जाता है. यह मुसीबत में पड़ने पर ही किसी पर हमला करता है, वरना यह काफ़ी शान्त रहता है. इसी तरह यमराज भी किसी मनुष्य का अन्तिम समय आने पर ही उससे मुखातिब होते है, इससे पहले वह जीवन भर किसी की ज़िन्दगी में कोई किरदार नहीं निभाते हैं.

10. सूर्य पुत्र शनि का वाहन कौवा

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वैसे तो शनिदेव की 9 सवारियां है, लेकिन उनमें से उन्हें सबसे ज़्यादा कौवा ही पसन्द है. कौए स्वभाव से काफ़ी बुद्धिमान होते हैं. कौए की मौत कभी भी किसी बीमारी या दुर्घटना से नहीं होती है. इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से ही होती है.

कौए को भविष्य में घटने वाली चीजों का पहले से ही पता चल जाता है. इसे पित्रों का आश्रय स्थल भी कहा जाता है.

11. काल भैरव का साथी कुत्ता

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दुनिया के बाकी पंथ और सम्प्रदायों में कुत्ते को लेकर काफ़ी मिली-जुली मान्यताएं हैं. हमारे सनातन धर्म में कुत्ते को तेज़ बुद्धि वाला प्राणी माना जाता है. कुत्ते को खाना खिलाने से काल भैरव ख़ुश होते हैं. कुत्ते को पास रखने से मनुष्य आकस्मिक मृत्यु से बचा रहता है. बुरी आत्माएं कभी भी कुत्ते के पास नहीं फटकती हैं.

सनातन धर्म के प्रवर्तकों ने आध्यात्म के साथ-साथ जो प्रकृति साम्य वातावरण तैयार किया, वो सभी धारणाएं इस धर्म को ख़ास बनाती हैं. जानवरों को भगवान का प्रतीक मानना वाकई में एक अजीब लेकिन अच्छी बात है.

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