भारत में कई तरह की होली कहली जाती है, लेकिन लठ मार होली हमेशा से ही चर्चा का विषय रही है. ये प्रथा सदियों से चली आ रही है, जिसमें नन्द गांव के लड़के बरसाने की लड़कियों के साथ होली खेलने पहुंचते हैं, तो रंगों के साथ उन्हें लाठियां भी खानी पड़ती हैं. इसी होली को 'लठ मार' होली कहते हैं.

लेकिन होली के इस मज़ेदार रूप के पीछे एक सच्चाई भी है. सच ये है कि इस होली में लड़कियों को कई तरह की बदतमीज़ियों का सामना करना पड़ता है. रंग और भांग के नशे में डूबे लोग होली के त्योहार की हदें पार कर जाते हैं और भीड़ में खड़ी महिलाएं झेलती हैं लोगों के गंदी हरकतें और न जाने क्या-क्या.

दुनियाभर से पत्रकार, फ़ोटोगाफ़र इस होली को देखने पहुंचते हैं और इन्ही में से एक हैं मेघना संका और दीप्ती अस्थाना. दोनों ही इस होली के होली के बारे में थोड़ा और जानने के लिए ब्रज पहुंची. लेकिन उनके साथ जो वहां हुआ, उसे पढ़ कर कोई भी महिला वहां जाने से मना कर देगी.

मेघना ने नंदगांव का अपना अनुभव शेयर किया, जिसमें उनके साथ हुए अभद्र व्यवहार का साफ़ विवरण लिखा हुआ था. मेघना ने बताया कि कैसे लठ मार होली के दौरान पहले साधु ने अपने हाथ को उनके प्राइवेच पार्ट को, टच किया और जब तक मेघना कुछ रिएक्ट करती वो वहां निकल गया. लेकिन ये सिर्फ़ एक वाक्या था. वहां खड़े लड़कों के झुंड ने पिचकारियों से उनके प्राइवेट पार्ट्स पर रंग डालना शुरू किया. इससे बचने के लिए उन्होंने अपनी जगह बदली, लेकिन पिचकारी की धार उनके पीछे-पाछे आती रही. अंत में इससे बचने के लिए उन्हें एक दुकान में घुसना पड़ा.

उन्हें कांच मिले रंगों के कारण कई दिनों तक दर्द रहा और उनकी त्वचा बुरी तरह से छिल गई. जिसका दर्द उन्हें वहां से आने के बाद भी दो दिन तक होता रहा.

मेघना जैसा ही अनुभव ट्रैवल फ़ोटोग्राफ़र दीप्ती अस्थाना के साथ भी हुआ. उन्होंने बताया कि होली के हुड़दंग के बारे में उन्हें पता था, इसलिए उन्होंने अपने कैमरे को अच्छे से पैक किया और कोशिश की वो कपड़े वहां के लोकल्स जैसे ही पहने. वो जैसे ही नंदगांव पहुंची, लड़कों के एक बड़े ग्रुप ने उन्हें घेर लिया और पिचकारियों से रंग बरसाने लगे. उन लड़कों का निशाना दीप्ती के प्राइवेट पार्ट्स थे. दीप्ति को जल्द ही लड़कों के मनसूबे समझ आ गए और उन्होंने वहां से वापस आने का फैसला लिया.

ये तो सिर्फ़ इन दोनों की कहानी है. न जाने सालों से कितनी लड़कियों के होली के हुड़दंग और मौज मस्ती के बहाने इस तरह की हरकतों का शिकार होती है. एक तरफ़ हम अपने संस्कृति की बढ़ाई करते नहीं थकते और दूसरी तरफ़ ऐसी हरकतें करते हैं. वहां के समाज और इसके ठेकेदार, जिन्हें राधा के जयकारे लगाने में भक्ति दिखती है और राधा के स्वरूप को बेइज़त करने में मज़ा आता है, उन्हें बस यही कहना है, किसी को बेईज्ज़त कर के होली क्या कोई भी त्यौहार की परंपरा नहीं है.

Image Source: Deepti Asthana