पिछले साल तक, मध्यप्रदेश का इंदौर शहर प्लास्टिक और उससे होने वाले कूड़े की समस्या से जूझ रहा था. लोग अंधाधुंध प्लास्टिक से बने थैलों का इस्तेमाल करते थे, जिसको जगह-जगह इकट्ठा करके जला दिया जाता था और उसकी वजह से हवा में जहरीले गैस और धुंआं फैला रहता था. इस कारण वहां की वायु भी प्रदूषित हो गई थी. लेकिन इसी साल जनवरी शहर में जमा होने वाली प्लास्टिक को रीसायकल करने का एक रास्ता निकाला गया, और वो रास्ता था रीसायकल प्लास्टिक से सड़कों को बनाना.

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मगर ये केवल एक उदाहरण है कि मध्य प्रदेश के सबसे व्यस्त शहरों में से एक इंदौर ने इस साल भारत के सबसे अधिक स्वच्छ शहर की सूची में पहले नंबर पर कैसे अपना नाम शामिल किया है.

आज की तारीख में रिहायशी इलाके हों या फिर व्यावसायिक एरिया, पूरे शहर से प्रतिदिन 1000 मीट्रिक टन से ज़्यादा कचरा इकठ्ठा किया जाता है. इंदौर में घर-घर जाकर कूड़ा उठाने की सर्विस (Door-to-Door Service) बतौर एक पायलट प्रोजेक्ट साल 2015 में शुरू की गई थी. ये सर्विस शहर के 84 वार्ड्स में शुरू की गई थी, जिसे अपार सफ़लता मिली. शहर के हर कोने, हर घर से यानि कि रोज़ाना 100 प्रतिशत कचरा इकठ्ठा करने में करीब 1 साल लग गया.

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शहर को स्वच्छ बनाये रखने के लिए इंदौर नगर निगम ने अब और बड़े लक्ष्यों को निर्धारित किया है. जिनमें अपशिष्ट को पूर्ण रूप से अलग करना, Devguradiya में स्थित शहर की लैंडफ़िल साइट को मैनेज करना और 2019 तक एक अपशिष्ट-संयंत्र बनाने की योजना शामिल हैं.

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शहर को स्वच्छ बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक देवगुरिया की लैंडफिल साइट पर कचरे का प्रबंधन करना है. क्योंकि वहां पर इकट्ठे किये गए कूड़े में रिएक्शन होने से तरह-तरह की ज़हरीली गैसें बनती हैं, जो वायु को प्रदूषित करती हैं. इस समस्या को ख़त्म करने के लिए नगर निगम के अधिकारियों ने एक आधुनिक ट्रांसफर स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाई है (जो कचरे को टिपर्स से कलेक्शन सेंटर तक ले जाएगा). इसके अलावा छोटे प्लांट्स की स्थापना और सञ्चालन किया जाएगा. इतना ही नहीं यहां छह एकड़ से अधिक की दो तकनीकी से लैस लैंडफिल साइटें बनाई जा रही हैं. इस तकनीक को बायोरेमेडिएशन कहते हैं, जो एक अपशिष्ट प्रबंधन तकनीक है. इसमें प्रदूषकों को बेअसर करने के लिए जीवों का उपयोग किया जाता है. इस तकनीक को आने वाले दो सालों में कचरे को ख़त्म करने में भी किया जायेगा.

शहर में इस तरह का प्लांट स्थापित करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट भी दे दिया गया है. इसके अलावा एक अलग योजना भी है. पर्यावरणविद कहते हैं कि इस समस्या का अंत प्लास्टिक की थैलियों का पूर्ण प्रतिबंध है. जो कि व्यवहार परिवर्तन की मांग करता है. जब तक लोग प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग करना बंद नहीं करेंगे, तब तक पूर्ण रूप से संभव नहीं है. मगर अब जब इंदौरवासियों ने स्वच्छता अभियान के सकारात्मक प्रभाव को चख लिया है, तो ये उनके लिए ज़्यादा मुश्किल काम नहीं होगा.

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पर गौर करने वाली बात ये है कि साल 2011-12 में जो इंदौर सफाई के मामले में 61वें स्थान पर था, वो 2015 में 25वें स्थान पर पहुंचा और इस साल स्वच्छता अभियान के तहत देश के कराए गए सर्वे में इंदौर ने पहले स्थान पर कब्जा किया है. लेकिन ये सब ऐसे ही संभव नहीं हुआ इसके लिए राज्य सरकार और शहरवासियों सब ने मिलकर अपना योगदान दिया है.

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शहर को स्वच्छ बनाने के लिए उठाये गए ये महत्वपूर्ण कदम:

  • इंदौर में नगर निगम ने सैकड़ों कर्मचारियों और आधुनिक मशीनों से सफाई व्यवस्था को सुचारू बनाया.
  • यहां पर वेस्ट मैनेजमेंट पर भी काम किया गया.
  • घर-घर से कचरा उठाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया, जिसमें कचरा उठाने के लिए हर घर तक नगर निगम की गाड़ी पहुंचती है.
  • गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग रखा जाता है. गीला और सूखा कूड़ा अलग-अलग के कारण तुरंत प्रोसेसिंग के लिए भेज दिया जाता है.
  • नगर निगम और जिला प्रशासन ने जागरुकता अभियान भी चलाए.
  • शहर से की सैंकड़ों बड़ी कचरा पेटियों को हटवाकर इनकी जगह लगाए गए हजारों छोटे डस्टबिन.
  • यहां कचरे से खाद बनाने के अलावा प्लास्टिक सामग्री को प्रोसेस कर सड़क बनाने में भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
  • खुले में शौच से मुक्त कराने के लिये नगर निगम ने अभियान छेड़कर लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ायी और करीब 2,549 एकल शौचालय बनाये गये.

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