बनारस, कहते हैं यहां आकर लोगों को मोक्ष मिलता है. ये शहर है बाबा भोलेनाथ की भक्ति का. बनारस को लोग यहां की घाटों के लिए जानते हैं. चूंकि मैं बनारस कुछ ही बार गई हूं, इसलिए हक़ीक़त से ज़्यादा इस शहर को मैंने कल्पनाओं में देखा है. बनारस का नाम सुनकर आंखों के सामने तंग गलियां और ज़ुबान पर 'खईके पान बनारस वाला' गाना आ जाता है. मेरी कल्पनाओं वाला बनारस धार्मिक से ज़्यादा आशिक़ाना है.

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फ़ेसबुक पर ही कुछ दोस्तों के विश्वनाथ टेम्पल की कॉफ़ी पर बनने-बिगड़ने वाले रोमांस के किस्से पढ़े थे. इन्हीं में मैंने दूर से बनारस के चाट और गोलगप्पे वाले प्यार को देखा था.

लेकिन, इस शहर के लिए मेरा इश्क़ तब और बढ़ गया जब मैंने 2013 में आई फ़िल्म 'रांझणा' देखी. पहले बनारस मेरे लिए चेतन भगत की किताब 'रिवॉल्यूशन 2020' के 'गोपाल' वाला बनारस था. अब 'रांझणा' के 'कुंदन' वाला बनारस है.

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बनारस के मंदिरों की बात करने पर अपने आप ही मंदिर के ऊपर खुशी से बौराया कुंदन चढ़ता हुआ दिख जाता है. इसी तरह इस घाट की कल्पना में उसमें नदी में स्कूटर लेके घुस रहे कुंदन की तस्वीर दिखती है.

रांझणा' देखने के बाद बनारस मेरे लिए साधुओं और कर्मकांड वाला बनारस रह ही नहीं गया था.

फ़िल्म का हर किरदार एक रियलिस्टिक टच लिए हुए था. कुंदन ने प्यार किया तो सिर्फ़ उसकी ही परवाह की. मुरारी ने दोस्ती की तो सिर्फ़ दोस्त का साथ दिया और बिंदिया ने कुंदन को चाहा तो उसकी खुशी के आगे हमेशा अपनी चाहत को झुका लिया. इस फ़िल्म ने दर्शकों के सामने ऐसे रिश्ते रखे कि उनका दिल एक बार तो बनारस के नाम पर धड़का ही होगा. बनारस की गलियां जितनी तंग हैं, यहां के दिल उतने ही बड़े. कम से कम इस फ़िल्म से तो यही छवि बनी है.

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बॉलीवुड में कम ही फ़िल्में हैं जो इस तरह के मोहल्ले के रोमांस पर बनीं हों. ऐसा प्यार जो साइकिल से स्कूल आते-जाते हो जाए. प्यार जो एक गोलगप्पे के लिए तरस जाए. प्यार जिसके लिए साइकिल से ऑटो के पीछे भागा जाए. शायद इसलिए भी इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों में जगह बनाई है.

'मुहल्ले के लौंडो का प्यार अकसर डॉक्टर और इंजीनियर उठा के ले जाते हैं'. ये डायलॉग ज़्यादातर मोहल्ले के आशिकों की कहानी है. यहीं से मेरे कल्पनाओं वाले बनारस में एक गली और जुड़ गई. टूटे दिलों वाली गली. लेकिन ये फ़िल्म दिखाती है कि कैसे ये प्रेमी टूटे दिलों में भी अपनी खुशी ढूंढ लेते हैं.

रांझणा अपने डायलॉग्स की वजह से भी अपने दर्शकों के दिलों में उतर गई थी. इसके कई डायलॉग तो अभी भी लोगों की ज़ुबान पर हैं.

इलाका तो कुत्तों का होता है.

नमाज़ में वो थी पर लगा दुआ हमारी मंज़ूर हो गई.

हम खून बहाएं तुम आंसू बहाओ, साली आशिक़ी न हो गई, लाठीचार्ज हो गया.

तुम्हारा प्यार न हो गया, साला UPSC का एग्ज़ाम हो गया, साला 10 साल से पास ही नहीं हो रहा है.

दिल न साला लेफ़्ट में होता है, न राइट में, सेंटर में होता है, क्योंकि हम में वहीं दर्द उठ रहा था.

बनारस के लोग क्या इमोशनल होकर भी इतने हाज़िर जवाब होते हैं. जो भी हो, फ़िल्म में तो रोने-धोने के बीच यही डायलॉग्स थोड़ा बहुत मज़ा दिलाते हैं. जितने मज़ेदार ये डायलॉग्स हैं, उतने ही खूबसूरत इस फ़िल्म के गाने भी हैं.

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एक बनारसिया के ठाठ और शरारतों को गीतकार इरशाद कामिल ने जिस खूबसूरती से पिरोया है, उतना ही शानदार तरीके से श्रेया घोषाल ने इसे निभाया है.

इसी तरह इस फ़िल्म के एक गाने 'पिया मिलेंगे' ने मुझे कई रियल लाइफ़ सिचुएशन में हिम्मत दी है. ये अल्फ़ाज़, 'जिसको ढूंढे बाहर-बाहर वो बैठा है भीतर छुपके' किसी भी हालात में खुदपर भरोसा करने के लिए प्रेरित करते हैं.

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फ़िल्म के अंत में जब कुंदन की जान जा रही होती है, उस समय बेहद मार्मिक अंदाज़ में वो कहता है, 'उठेंगे किसी रोज़ फिर से गंगा किनारे डमरू बजाने को, उन्हीं गलियों में दौड़ जाने को, किसी ज़ोया के इश्क़ में फिर से पड़ जाने को', हमारे दिलों में नम आंखों के साथ बनारस, उसकी गलियां और वहां बसने वाले इश्क़ की अमिट छाप छोड़ देता है. फ़िल्म ख़त्म हो जाती है, तब जाकर हम बनारस से बाहर आ पाते हैं.

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वैसे बनारस में रहने वाले लोग कहते हैं कि बनारस को फ़िल्मों में चाहे जितना देख लो, किताबों में पढ़ लो, लेकिन असल बनारस तो वहां रहे बिना नहीं समझ सकते हैं. सुना है, बनारस की हर गली में कोई कुंदन अपना स्कूटर स्टार्ट करता है, हर रिक्शे पर कोई ज़ोया जाती है, हर छत पर कोई बिंदिया रहती है और हर दोस्त मुरारी सा होता है. बनारसियों का कहना है इन फ़िल्मी कहानियों से कहीं ज़्यादा सुंदर होते हैं, असली 'इश्क़ बनारसिया'!

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