‘जान पर खेलने’ और ‘जान के खेलने’ में बड़ा अंतर है. मुंबई में आए निसर्ग तूफ़ान के दौरान क्रांतिकारी पत्रकारिता ने इसे एक बार फिर साबित कर दिया. दरअसल, तूफ़ान ने एक साजिश के तहत जानबूझकर रिपोर्टिंग कर रहे एक रिपोर्टर को अपनी चपेट में ले लिया. जी हां, डरावना ये रहा कि इस साज़िशकर्ता तूफ़ान ने सिर्फ़ रिपोर्टर को ही अपनी चपेट में लिया, बाकी दुनिया मजे से पीछे टहलती दिखाई दी.

वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि सारी तेज़ हवाओं और पानी की बौछारों ने अकेले 'मासूम रिपोर्टर' पर ही हमला बोल दिया. मानो पूरी कायनात ने मिलकर ज़मीन से जुड़े पत्रकार के कदम उखाड़ने का तय कर लिया हो. रिपोर्टर को देख मुझे भाईजान की फ़िल्म ‘प्यार किया तो डरना क्या’ का एक सीन याद आ गया, जिसमें बॉलिंग करते एक एक्टर को हवा का झोंका हिला रहा था, डुला रहा था. सच्ची-मुच्ची कह रिया हूं अगर ‘याईये’ म्यूज़िक बैगराउंड में चला दें, तो एकदम वैसा ही फ़ील आएगा.

पत्रकारिता जगत में ऐसे सीन दिखना यूं तो आम बात हो गई है, लेकिन संवाददाता से ज़्यादा तारीफ़ का हकदार जांबाज़ कैमरामैन निकला. जिस तूफ़ान में रिपोर्टर झूम बराबर झूम हो रखा था, ऐसे कठिन हाल में भी मजाल थी कि कैमरा तनिक भी हिल जाता.

हालांकि, ख़तरों के बेताज बादशाह पत्रकार की इस रिपोर्टिंग पर गर्व करने के बजाय लोग सवाल उठाने लगे. जिस रिपोर्टर को मैग्सेसे और गोयनका अवॉर्ड से नवाज़ा जाना चाहिए था, उसे सोशल मीडिया पर कुछ मुंए ट्रोल कर रहे हैं.

हमारे देश में पत्रकारों पर हमले आम बात हो गई है. इंसानों के साथ-साथ अब हमारे पत्रकार तूफ़ानों का शिकार भी बनने लगे हैं. ऐसे में प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में हमारी रैकिंग कैसे सुधरेगी. एक ज़िम्मेदार पत्रकार होने के नाते मेरी तो महाराष्ट्र सरकार से मांग है कि बाकायदा कमेटी बनाकर इस निसर्गवे के खिलाफ़ जांच की जाए और इसे सख़्त से सख़्त सज़ा हो, ताकि फिर कभी किसी कमसिन रिपोर्टर को अकेला देख कोई तूफ़ान हमला करने की हिमाकत न कर सके.

ऐसी क्रांतिकारी पत्रकारिता सदैव अमर रहे!