चार बहनों के बाद पैदा हुए थे इसलिए बाप ने अतिरिक्त ख़ुशी दिखाते हुए साहब का नाम लकी रख दिया. नाम रखना तो ख़ैर बाप की जागीर था, मगर अक़्ल भेजे में नहीं रखवा पाए. यही लिए पूरी ज़िंदगी नाम के विपरीत पनौती में ही बीती. मूर्खता में बड़े-बड़े चमन सूतिये भी उनके शागिर्द थे.

मूर्खता का सर्टिफ़िकेट लकी भाई को स्कूल में ही मिल गया था. दरअसल, वो शरारत भी कांड का चिलम फूंक के करते थे. अरे मतबल कि बेसुध बवाल काटते थे. हुआ यूं कि एक मास्टर साब थे, सिर पर उनके दुई चार बाल लहराया करत रहे. यही लिये बच्चा लोग उनका चम्पू बुलात रहे. मास्टर साब जब क्लास से पढ़ा के दरवाजे तक पहुंचे, लकी भाई के बगल में बैठा लौंडा उनके टकले पर चॉक जड़ दे. मास्टर साब ग़ुस्से से पीछे देखें, तो कोई सुराग नहीं. दो-चार दिन तो चल गया, लेकिन एक दिन झट से मास्टर साब पलट गए और लौंडा रंगे हाथ धरा गया. फिर शुरू हुई पिलाई.

अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें लकी भाई की मूर्खता वाली बात क्या है? अजी हुआ यूं कि जो लौंडा पिट रहा था, वो बार-बार ये कहता जाता, ‘मास्टर साब हमने नहीं मारी, हमने नहीं मारी. आप लकी से पूछ लो.’ मास्टर साब लकी की तरफ़ देखे और भाई हमारे तपाक से बोल दिए, ‘न मास्टर साब न, इसने नहीं मारी. विद्या रानी कसम’ इत्ता बोलना ही था कि लौंडे को छोड़ मास्टर साब लकी पर ही टूट पड़े. दे घूसे, दे घूसे लिटा दिया. पूरे क्लास में नचा-नचा के हौका. अमेरिका ने ईराक और अफ़गानिस्तान में भी इत्ती तबाही नहीं मचाई होगी, जित्ती लकी के पूरे शरीर पर मास्टर साब ने.

खै़र जैसे-तैसे बारवीं निपटी, अब बड़ा फ़ैसला करना था. लकी भाई अपने आर्ट्स पढ़ेंगे, कॉमर्स या फिर साइंस. देखो ईमानदारी से साइंस कभी ऑप्शन था ही नहीं. घरवालों को पता था कि मंगल पर ससुरा जीवन मुमक़िन है लेकिन लकी की लाइफ़ में साइंस नहीं. आर्ट्स ऑप्शन होते हुए भी नहीं रहा. काहे कि मुहल्ले वाले अभी से समझ जाएंगे कि लौंडा नाकारा है. कुछ नहीं तो डिसाइड हुआ कॉमर्स.

इस मगजमारी से जुदा लकी भाई अलग ही सपनों में लहरा रहे थे. भाई ने किसी से सुन लिया था कि कॉलेज के तीन साल मने अय्याशी. बस फिर क्या ये तीन साल कब बीते लकी भाई को भी हवा नहीं लगी. अय्याशी के नाम पर खाली इत्ता किए कि चार बार कॉलेज में लौंडों से कूटे गए.

कॉलेज में झंडे गाड़ने के बाद अब सवाल नौकरी का था. लेकिन मिले कहां से? पता नहीं कौन साला इनको ये सलाह दे दीहिस कि लकी भाई तुम पढ़ते भले ही न हो पर दिमाग तुम्हारा बहुतई बढ़िया है. अमा ठिंगे कि हमारी मानो आईएएस की तैयारी करो. बता दें, जिस ज़माने में 99.99 फ़ीसदी बच्चा हाईस्कूल पास हुआ था, उस वक़्त भी ये ‘थर्ड डिविज़न विद ग्रेस’ निकले थे. मगर लकी भाई तो फिर लकी भाई हैं, शुरू हो गई तैयारी.

तैयारी कुछ ज़ोर मार पाती उसके पहले ही इश्क़ ने जोर मारना शुरू कर दिया. जिस कोचिंग में अधिकारी बनने गए थे, वहां बॉयफ्रेंड बन गए. मोहब्बत ऐसी थी कि भाई हमारे किताबें भी जूतों की तरह खरीदते थे. मतलब हमेशा एक जोड़ी. एक अपने लिए और एक उनके लिए. लड़की की पेन-पेंसिल से लेकर उसको हर परीक्षा दिलाने जाते थे. चार बजे फ़ोन कर उसको जगाते थे, ‘हेल्लो पुच्चू. उठो न. ए बच्चा उठ जाओ न. आज सल्तनत काल पूरा ख़त्म करना है.’

लड़की क़ाबिल थी, उसने सल्तनत काल के साथ-साथ ग़ुलाम वंश भी निपटा दिया. आज वो स्टेट सर्विस में कमर्शियल टैक्स ऑफ़िसर है और उसका पति आईएएस.

लड़की गई तो शहर भी छूट गया. आगे की कोचिंग करने दिल्ली आ गए. कोचिंग में एडमिशन लेने से पहले ही बेचारे हॉस्पिटल में एडमिट हो गए. पता चला कि कोरोना हो गया. ये पहली बार था, जब उनकी ज़िंदगी में कुछ पॉज़िटिव हुआ था.

ज़िंदगीभर चोट खाने बाद लकी भाई का इम्यूनिटी सिस्टम मजबूत हो चुका था. कुछ दिनों में तबियत सुधर गई. हॉस्पटिल से निकल ही रहे थे कि डॉक्टर साहब बोले, ‘अरे बच के रहना बेटे आज एक अप्रैल है...’

ये सुनते ही लकी भाई खींसे निपोरते हुए बोले, ‘आप भी का मज़ाक करते हो डॉक्टर साहब! जिस आदमी की पूरी ज़िंदगी ही मूर्खता में बीत गई हो, उसका ये मुआ अप्रैल फ़ूल क्या बिगाड़ लेगा?’