पुरानी बात बता रहा हूं लेकिन मज़ेदार है. 1 सितंबर को रविवार था, देर रात तक पार्टी चली, सोना देर से हुआ, सुबह उठना भी देर से हुआ. सोमवार को ऑफ़िस जाना होता है, बिजली की रफ़्तार से तैयार होने के बाद, जब बाइक लेकर सड़क पर उतरा तो अजीब सा महसूस हुआ. रातों-रात दुनिया बदल चुकी थी.

जब तक सड़क पर चार लोगों को गाली न दो, तब तक गली से निकलने की जगह नहीं मिलती थी. उस दिन मुहल्ले में रास्ते के बीच में सिर्फ़ कुत्ते बैठे थे. घर के सामने गली में पार्क होने वाली गाड़ियों का नामो-निशान तक नहीं था, मुझे लगा मैं कुछ ज़्यादा ही देर से उठा हूं, सब ऑफ़िस चले गए होंगे.

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मेन रोड पर आया तो नाक को एक ठंडक सी महसूस हुई. आमतौर पर मैं हेलमेट के भीतर भी रुमाल बांध कर बाइक चलाता हूं, लेकिन उस दिन जल्दबाज़ी में भूल गया था. मुंडी घुमा कर देखा तो चारों ओर गाड़ियां ऑक्सीजन उगल रही थीं. हर एक सांस में फेंफड़े का रोम-रोम पुलिकत हो रहा था. पेड़-पौधे ईर्ष्या की आग में जल रहे थे. शायद सभी गाड़ियां पॉल्युशन टेस्ट में टॉप करने के बाद ही अपने गराज से निकली थीं.

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अभी थोड़ा आग बढ़ा ही था कि एक अजीब वाकया हुआ. आगे चल रहा ऑटो, इंडिकेटर जला कर बायें मुड़ा. मैं एक पल को सकपका गया, हो सकता है ऑटो वाला नया-नया शहर में आया हो. जब गौर करना शुरू किया तो सारे ऑटो वाले ऐसा ही बर्ताव करते दिखे. मैंने सोचा इस शहर को हुआ क्या है?! हद तो तब हो गई जब एक बाइक वाले को सिग्नल ग्रीन होने का इंतज़ार करते हुए देखा. कुछ तो झोल-झाल था बॉस! कहीं मैं रात में सोने के बाद सीधा रामराज्य में तो नहीं उठा?

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फिर ध्यान आया कि देश में नया वाला मोटर व्हिकल एक्ट लागू हो चुका है, जिसके तहत वसीहत लिखाऊ चालानों के प्रावधान हैं. तभी सभी चीटियों की माफ़िक कतार में चल रहे हैं. कोई अपनी लेन से बिलानभर भी दाया-बायां नहीं खिसक रहा था. रेड की क्या पूछ रहे हैं, सभी गाड़ियां पीली बत्ती पर भी सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जा रही हैं. मजाल है कि किसी का चक्का ज़ेबरा क्रॉसिंग को छू भी जा रहा हो. ये क्रॉसिंग तो अब लक्ष्मण रेखा का रूप ले चुकी थी.

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शाम को जब ऑफ़िस से घर जाने की बारी आई. पहले चौराहे पर ही पर ही ट्रैफ़िक पुलिस को बोरियों में पैसे भरते देखा, कुल 10-12 बोरियां होंगी. सड़क किनारे जो बंदा हेलमेट बेचता था, माथे पर 'करोड़पति' लिखाये घूम रहा था. पार्किंग वाले साथ में बॉर्डी गार्ड लिए घूम रहे थे. ट्रक ड्राइवर सफ़ेद यूनिफ़ॉर्म में दिख रहे थे. Ambulance को सायरन बजाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ रही थी. ये सब देख मैं मन ही मन बड़ा ख़ुश हो रहा था, तभी बाइक का चक्का गया गड्ढे में, मैं गया हॉस्पिटल मैं और नई-नई उम्मीद को टोकरी गई गर्क में.