शहर छोड़ना बड़ा अजीब होता है. वो भी तब जब आप लखनऊ जैसे शहर में पले-बढ़े हों. एक उम्र रंगबाज़ी में काट दी. यहां का चप्पा-चप्पा नापे हैं. लेकिन मजूरी की ख़ातिर लखनऊ छोड़कर दिल्ली निकलना पड़ा. ख़ैर हम जैसे-तैसे मन को मनाए. सोचा दिल्ली ही तो है बे. जब चाहेंगे 1 घंटे की फ़्लाइट पकड़कर लखनऊ पहुंच जाएंगे. ऊपर से मुंगेरीलाल के हसीन सपने अलग आंखों में भर लिए थे. ‘सरोजनी के कपड़े पहनकर लौंडा जाएगा भइया डिस्को’…

कहते हैं कि दूर के ढोल सुहाने होते हैं, लेकिन कोई ससुरा ये नहीं बताइस की ढोल पास जाने पर फट भी जाते हैं. दिल्ली में हमारे क़दम पड़े नहीं कि मुआ कोरोना आ धमका. ऑफ़िस वालों ने वर्क फ़्रॉम होम की गोली दे दी और हम मस्त खाकर पसड़ गए. काहे कि हमारे रूम पार्टनर बताए थे कि ‘भाई यहां हर शुक्रवार को जबर पार्टी होती है.’ बस पार्टी की खुजली ज़्यादा थी तो हम लखनऊ लौटने की बजाय शुक्रवार का इंतज़ार करने लगे.

ज़ाहिर है अब खुजली होगी तो उंगली भी होगी. मुझे उंगली की रूम पार्टनर्स ने, हरामखोर एक-एक कर वहां से चंपत हो लिए. मैं खाली बैठा उस मनहूस शुक्रवार का ही इंतज़ार करता रह गया. पार्टी नहीं हुई लेकिन मोदी जी ने आकर केक काट दिया. पूरे देश में लॉकडाउन घोषित. भइया उसके बाद असली ढोल फटने शुरू हुए. मतलब दो महीने रो दिए.

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हर पल बस यही सोचते रहते थे कि लॉकडाउन खुलेगा तो बवाल काट देंगे. आह! सोचकर ही झुरझुरी सी दौड़ जाती थी. मतलब ऐसे हम कोई रोज़ बाहर निकलकर उधम-चौकड़ी नहीं काटते थे. लेकिन फिर भी यार ज़बरदस्ती घर में कभी पिले भी नहीं रहे. बस सोच लिया था कि जब लॉकडाउन खुलेगा, तो हम गुरू दाबेंगे खाना, वो भी हौक के. काहे कि जबसे सब ससुरा बंद हुआ, ज़िंदगी एकदम बेस्वाद हो गई थी. एक दिन ऐसा नहीं हुआ कि जबर खाना चापें हों. मटन, मुर्गा तो मतलब, जाने दो बे... बात करते हैं तो ज़ुबान लपलपा जाती है.

ऊपर से जो टिफ़िन सर्विस लगाए थे, वो इत्ती बेकार मतलब दर वाहियात खाना बनाता था कि क्या ही बताएं. मने उसको अगर मुगलिया दरबार में पेश कर दें, तो हर रोज़ तीन बार कम से कम उसका सिर क़लम किया जाए.

बस अब सोच लिया था, लॉकडाउन खुलते ही घर निकलेंगे. खाने की लिस्ट तैयार कर ली थी. हर रोज़ के हिसाब से दो टाइम का खाना सेट था. मंगल (जय हनुमान जी) छोड़कर बाकी दिन भइया सिर्फ़ मास नोचने का इरादा बना लिए थे.

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वो दिन भी आ ही गया, जब हम लखनऊ के लिए निकले. कभी प्लेन में नहीं बैठा था, सोचा था जब बैठूंगा तो मस्त सेल्फ़ी लूंगा. लेकिन इस कोरोना ने मुंह दिखाने लायक तक नहीं छोड़ा. अरे मतलब, दुई ठोर मास्क, एक फ़ेस गार्ड लगाकर चोमू बना बैठा रहा. ऊपर से हल्का सा खांस दो तो साला बगल वाला अलग से घूरे. ग़लती से भी छींक दिए होते तो उड़ते प्लेन से फेंक दिए जाते. कसम से बता रहे डर के मारे पूरे रास्ते छींक रोके थे.

ख़ैर लखनऊ पहुंचे तो 10 दिन तक कमरे में बंद रहे. जो खाना बनता कमरे में मिल जाता. अब दो से चार दिन ही घर पर इज़्ज़त मिलती है, वो टाइम हम अकेले काट दिए. जो दो टाइम के खाने की लिस्ट बनाई थी, उसका कुछ अता-पता नहीं है. मेरा पहला इश्क़ यानि कि मेरी बुलट बेचारी हमको निहारती है, मानो कह रही हो, ‘जानू चलो न, कितना दिन हो गया आप बाहर घुमाने नहीं ले गए.’ अब हम कैसे समझाएं कि ‘डार्लिंग बाहर तुम्हारा बाप कोरोना घूम रहा. देख लेगा तो हमारी हमेशा के लिए सोशल डिस्टेंसिंग हो जाएगी.’

आलम ये है कि न अब टुंडे के कबाब हैं, न रहीम के कुल्चे-निहारी, न कुड़िया घाट है न ही रूमी गेट पर ऊंट की सवारी. इदरीस और लल्ला की बिरयानी को सोचकर मन तड़प उठता है. एक अरसा हो गया कहे हुए, ‘भइया दो 30-30 वाले बढ़िया कबाब रोल लगा दो’. अब तो बस इम्युनिटी बढ़ाने के नाम पर लौंग-लहसुन का नंगा नाच चल रहा है.