‘कैंची चलाते-चलाते कब हम गद्दी पे सवार हो गए

अनजाने ही पैंडल मारते-मारते बचपन के पार हो गए’

बचपन ऐसे ही बीत गया. ऐसे ही मतलब, आज के लौंडो टाइप नहीं कि मोबाइल में ही ख़त्म हुआ जा रहा. अपना वाला तो ग़ज़ब बवाली रहा है. तमाम ख़ुराफ़ातों से भरपूर. काहे कि पढ़ने वालों में तो नाम कभी दर्ज हुआ नहीं पर लद्धड़बाज़ों के हम चमकते सितारे थे.

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टीचरों को हमारी क़ाबिलियत पे इत्ता भरोसा था, कि वो हमसे कभी कॉपी-वॉपी चेक कराने को बोले ही नहीं. क्लास में आते ही वो सीधा हमें पीछे बेंच पे खड़ा करवा देते थे. ‘जाओ सिन्हा पीछे शक्कर की बोरी बन जाओ’.

अमा हां, शरीर से गोल थे, तो शक्कर की बोरी बनवा देते थे. एक मास्टर साब तो हमसे गोविंदा का नाच भी करवाते थे. वो चक्कर क्या था कि क्लास की फ़र्श में चौकोर-चौकोर डिज़ाइन बनी थी. हमको बीच में खड़ा कर क़ायदे से हौकते थे. बोल रखे थे कि चौखंटे से निकले तो बात घर पे पहुंचेगी. बस हम अंदर ही गोविंदा की तरह ठुमकते हुए पिटते थे.

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इन सबके बावजूद हमारी ढिठई में तनिक भी कमी नहीं आई. स्कूल में एक कैंटीन वाले भइया थे. कैंटीन क्या बे, ससुरा समोसा और हरी चटनी लेकर बैठता था. बहुत कलाकार बनता था. अठन्नी भी कम पड़ जाए तो हाथ से समोसा वापस छीन लेता था. एक दिन हो गया मूड ख़राब. सारे लौंडों को किया इकट्ठा और पांच सौ के नोट का किया जुगाड़.

अगले दिन दो समोसा लेकर थमा दिए पांच सौ की क़रारी पत्ती. कहने लगा टूटे नहीं हैं, हम बोले अमा रोज़ लेते हैं, रख लो. आगे काटते रहना. तीन दिन नहीं हुए कि हम लोग पूरे पैसे के समोसे दाब गए. फिर शुरू हुआ उधार. हमने पैसा कटाने से शुरुआत की और बाद में उसका ही तगड़ा काट दिया. चवन्नी भी वापस नहीं की.

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लेकिन साला धरा लीहिस था. होता क्या था कि हम लोग मारते थे गोला (क्लास बंक). ये बात कैंटीन वाले को पता थी. हर रोज़ की तरह हम लोग लंच टाइम में बैग लेकर साइकिल स्टैंड पहुंचे. साइकिल स्टैंड पर ही बाथरूम था, जिसकी छत से चढ़कर हम स्कूल के बाहर फ़ांद जाया करते थे. मैं ज़्यादा कलाकार बनता था इसलिए पहले ही फ़ांद पड़ा. जैसे ही नीचे गिरा, देखा पीछे कैंटीन वाले के साथ अग्निहोत्री खड़ा. अग्निहोत्री मने हमारा प्रिंसिपल. भाईसाब, हवा टाइट. हलक में आवाज़ दब गई.

अंदर से दोस्त कहें, अबे कोई नहीं है तो आएं. हम भी कहे, हां, आओ... अब काहे अकेले हौके जाएं. तुम भी आओ ही. हमारे पूरे स्कूल का इतिहास है. हमारे ग्रुप के अलावा कोई ऐसा नहीं रहा, जिनको ग्राउंड में बिना शर्ट खड़ा कर कुत्तों की तरह हौका गया हो. ऊपर से पांडे सर तो और नंबरी निकले. कहने लगे प्रिंसिपल साब, ये लौंडे बहुत उत्पाती हैं, इनकी तो कलमें खींचिए. भाई, सच बता रहें, टीचर जब कलम के बाल पकड़कर खींचता है तो शरीर ग्रैविटी को फ़ेल करता ख़ुद-ब-ख़ुद ऊपर हो लेता है.

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ख़ैर स्कूल की बात आई-गई होती गई. हम उस उम्र पर पहुंच चुके थे, जहां बचपना आहिस्ते से जवानी को चूमता दिखाई पड़ता है. लौंडों वाले सरकारी स्कूल से थे, तो इश्क़ वगैरह की सोच भी डेवलेप न हो पाई थी. यही लिए शराब पीने का जुगाड़ बनाने लगे. पहली बार था तो सब एक्साइटेड थे. प्लान हुआ रात के अंधेरे में छब्बन की गली में बियर पी जाएगी.

शुक्ला को छोड़कर 4 लड़के पीने वाले थे. 60 रुपये की बियर में महज़ 60 रुपये ही कम थे. तीन ने 15-15 रुपये दे दिए. बस एक के पास नहीं थे. कहने लगा भाई अभी मिला दो, बाद में लौटा देंगे. हम बोले, अमा ठिंगे कि 15 ही थे, वो दे दिए. अब नहीं हैं. भाई नट्टी पे हाथ रख के दोस्ती क़सम खा रहे, हम कल मम्मी से लेकर दे देंगे. दोस्ती की क़सम, वो भी नट्टी पे हाथ रखकर, शुक्ला का दिल पिघल गया, तो दे दीहिस.

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चारों ने पी ली और फिर शुरू हुआ सड़क पर नंगा नाच. अच्छा चक्कर क्या था, शुक्ला पिए तो नहीं लेकिन नसेड़ी की एक्टिंग बहुत ज़ोर लगाकर कर रहा था. रात के क़रीबन 8 बजे होंगे. ये टाइम हमारे बाप के ऑफ़िस से लौटने का था. सड़क के बीच घर के चिराग की ये रंगबाज़ी देखकर पिता जी को आग लग गई.

गाड़ी से उतरते ही पीछे से कॉलर पकड़ लिए. हम भी बिना पीछे देखे अपनी दादी-बुआ को याद कर लिये. फिर चट-चट पूरी सड़क पर आवाज़ गूंजने लगी. लेकिन इस बीच पता नहीं शुक्ला को क्या खुझली मची थी कि बार-बार मेरे बाप को पकड़कर यही कह रहा था. ‘अंकल मेरा मुंह सूंघिए, हमने नहीं पी. अंकल जी, क़सम से एक बार तो सूंघिये हमने नहीं पी.’

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बस अंकल जी ने पकड़ा शुक्ला का मुंह और शुरू कर दी पिलाई. दे कंटाप, दे कंटाप शुक्ला का सुनहरा चेहरा चमकदार कर दिया. कहने लगे, साले नशा-पत्ती करता है और ऊपर से मुंह सुंघाता है.

उस दिन हम चारों ने सिर्फ़ एक बार अपने बाप से मार खाई थी और शुक्ला दो बार पेले गए. एक बार मेरे बाप के कर कमलों द्वारा उसका उद्घाटन हुआ और और दूसरी बार अपने बाप के चरण कमलों से नवाज़े गए. शुक्ला आज भी पीते टाइम यही कहता है कि साला उस दिन पी ही लिया होता तो ठीक था.