कई बार बेज्जती टाइप फ़ीलिंग झेल चुका हूं. इत्ता कोई लौंडों से नहीं हौका गया होगा, जित्ता मुझे ज़िंदगी में हिंदी-इंग्लिश ने मिलकर पेला है. काहे कि हिंदी मीडियम से हैं न. स्याला एकलौती फ़िल्म हमारी जाति को छुआछूत से मुक्त कराने आई थी, वो भी अब अंग्रेजी मीडियम हो गई. होनी ही थी, तरक़्की इसे ही कहते हैं.   

पिता जी घर के पास वाले स्कूल भेजे थे. शायद बचपन से उन्हें अंदाज़ा था कि घर में सुपुत्र के नाम पर उन्हें हमसे ही गुज़ारा करना पड़ेगा. यही लिये पैसा बचा लिये. स्कूल हिंदी माध्यम का था. इतना अनुशासन मोहब्बतें फ़िल्म में ‘बिग बी’ ने नहीं बरता था, जित्ता हिंदी को लेकर हमारे स्कूल में था. होता भी क्यों न! जब टीचर हमारे ख़ुद हई हिंदी से पीड़ित थे. जी हां, हिंदी से पीड़ित थे. अंग्रेजी तो अमीरों को लगने वाली बीमारी है. मने जिसमें आदमी अस्पताल में भर्ती नहीं हॉस्पटिल में एडमिट होता है.  

ख़ैर किसी तरह सातवीं तक पढ़े. घर वालों को एकाएक लगा चलो इसे 150 रुपये महीने से 400 रुपये महीने वाले 'ऊंचे' हिंदी मीडियम स्कूल भेजें. अगले ही साल उठाकर फेंक दिये गए. यहां से असल बेज्जती का डोज़ मिलना शुरु हुआ. अच्छा बताइये अंग्रेजी की शुरुआत कैसे होती है? अगर ‘ए बी सी डी’ से सोच रहे हैं तो अफ़सोस आप चवन्नी का सवाल हार चुके हैं. अंग्रेजी शुरु होती है टाई लगाने से. अब पहले वाले स्कूल में तो ये चक्कर था नहीं. लेकिन यहां था. मगर हम ठहरे कतई जाहिल. बांधनी ही नहीं आती. टाई ऐसे बांधते थे जैसे जूते का फ़ीता बांध रहे हों.  

नवा स्कूल शुरु हुआ और हमारी ‘अंडरवर्ल्ड’ में थू-थू का सिलसिला भी. टीचर क्लास मे आई तो हमारा सुनहरा चेहरा देख समझ गई ‘लौंडा नया है’. क्या नाम है तुम्हारा? मिस मेरा नाम है अभय. अभय? पूरा नाम बताओ? मिस अभय सिन्हा. हम्म!!! ये मिस-मिस क्या लगा रखा है? कहां के पढ़े हो? पता नहीं ये स्कूल कैसा है? यहां ये सब नहीं चलेगा. यहां ‘मिस’ नहीं ‘मैम’ बोलते है. अरे तेरी! मतलब काटो तो ख़ून नहीं वाली फ़ीलिंग. पूरा क्लास हमको ऐसे देख रहा था जैसे हमने ‘योगी जी टाइप कोरोना का इलाज बता दिया हो.’  

बरस भर स्कूल हमको और हम स्कूल को झेल पाए. अगले ही साल सीधा 400 रुपये महीना वाले से 200 रुपये छमाही वाले स्कूल में दाख़िला हो गया. ये स्कूल पिता जी के स्वादानुसार नहीं हमारी औकातानुसार था. पठन-पाठन जैसी बुराईंयों की यहां कोई जगह नहीं थी. मास्टर साब! तब हई आत रहे, जब उनका दुई-चार छात्र लोगों का तोड़े का मन होत रहा. अंग्रेजी की बीमारी यहां नहीं थी. वैक्सीनेशन का पुख़्ता इंतजाम था. इत्ता की एक बार हम अंग्रेजी पढ़ाने वाले मास्टर साब से पूछ लिये. सर ‘मे आई गो टू ट्वाइलेट’. बस ये पूछना मानो हमने पूरे क्लास में वायरस फ़ैला दिया हो. मास्टर साब बोले हियां आवा. का बोल रहा... मे आई... अंग्रेजी बोलत बा.. बड़का अंग्रेज हुई गवा है... क़सम से बता रहे, वो पीठ पर धनचुक्का मारे हमें कि एक बार तो सांस छाती में ही दब गई थी.  

12 वीं किसी तरह निपटा दिये. क्लास के साथ-साथ हार्मोन्स भी बढ़ रहे थे. इश्क. लिल्लाह! इश्क़. हर रोज़ होता था. अब हमारी जिंदगी का एक हई मक़सद था. किसी अंग्रेजी मीडियम वाली से मोहब्बत. पता नहीं काहे. मगर यार प्यार कोई करे लेकिन इज़हार अंग्रेजी में ही करना शोभा देता है. ‘आई लब यू’.  

अच्छा शुरु से लड़की कभी साथ रही नहीं. स्कूल ही लौंडो वाला था. लड़की की तलाश में कोचिंग पहुंच गए. मिल भी गई. पर स्याला बात कैसे करें. समस्या तीन अंग्रेजी के शब्द पैदा कर रहे थे. ‘Hi’, ‘Hey’, ‘Hello’. अब परेशानी ये थी कि मुंह है मेरा मोटा वो भी गोल. Hey बोले तो मुंह खिंच कर मेढक टाइप हो जाता है. Hello बोले तो गोल मुंह और गोल बन जाता है. और Hi के साथ समस्या हमारी स्माइल थी. यार स्माइल करते वक्त अजीब सा थूथन बन जाता. ऐसा कि सुअर भी शरमा जाए. पता नहीं क्यों पर ये है. ख़ैर हम ‘और क्या हाल है’ से काम चला लिये. और लड़की हमें समझ गई कि ये किसी काम का है नहीं.  

गुरु हम ज़िंदगी का साथ निभाते चले गए और नौकरी में आ गए. जित्ते काबिल थे, उत्ते ही हिसाब की नौकरी भी तलाशे. पर यहां तो अलग ही खेल चल रहा था ‘भैनचोर’. अंग्रेजी की चौतरफ़ा बाढ़ आई हुई थी. हर काम इंग्लिश में. मन होता बोल दूं भाई हम इत्ते क़ाबिल होते तो काहे यहां आते. लेकिन मजदूरी का मतलब ही फ़िर क्या हुआ?   

 चौरासी लाख़ योनियों में भटकने के बाद मानव-देह मिली. अब हिंदी-अंग्रेजी के लफ़डे में रगड़ी जा रही है.   

 इश्क़ में फ़ेल और नौकरी में ख़ेल के बाद यूं हाल है...   

‘हुआ ख़्वाब से वास्ता तो फ़लक तक गया 

हुआ ज़िंदगी से सामना तो दरक सा गया 
गम-ए-इश्क़ की बात तो हमसे मत कर शायर 
हक़ीक़त-ए-ज़िंदगी से शिक़वे अब असल हैं’