ये बात 1965 की है. आज से 56 साल पहले की. उस दिन एक तारा ज़मीन पर उतरा. मने, एक बच्चे का जन्म हुआ. मुहुर्त एकदम परफ़ेक्ट था. इतना कि उसने इस बच्चे को ही परफ़ेक्शनिस्ट बना दिया. लेकिन किसे पता था कि यही लड़का 90s का दशक आने से पहले लोगों की ज़िंदगी में ‘क़यामत से क़यामत’ तक का असर छोड़ने वाला था. 

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आप समझ चुके होंगे कि हम बात आमिर ख़ान की कर रहे हैं. आज भाई का हैप्पी बर्थडे है. पूरी दुनिया आज उन्हें बर्थडे विश कर रही है. पर हम यहां एक बात का विश्लेषण करने वाले हैं कि कैसे आमिर की मिस्टर परफ़ेक्शनिस्ट इमेज ने हम जैसे लोगों का बेड़ा गर्क कर दिया. 

आमिर हमारी लाइफ़ में फ़ाइट पैदा करने वाले हैं, इसका अंदाज़ा ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ के आते ही पता चल गया था. गाना जब आया था, तो हम भी कूल्हे मटका कर पिता जी के आगे बोल दिए थे, ‘मगर ये तो, कोई ना जाने के मेरी मंज़िल, है कहां’. बस फिर क्या, दूसरे ही मूमेंट में पापा हमें चप्पल लेकर दो मंज़िल तक दौड़ाए थे. अपने नाम का तो पता नहीं, हां, पर रिलैक्सो चप्पल का नाम आज भी हमारे मुंह पर पढ़ा जा सकता है.

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‘ग़ुलाम’ तक आते-आते तो आमिर ने कई ज़िल्लत भरे किस्से हमारी झोली में डाल दिये थे. फ़िल्म देखकर बाजू वाली लड़की से पूछ लिए, ‘ए क्या बोलती तू’. भाई इसके बाद हमें माचिस जलाने वाला सीन करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी. लड़की ने ख़ुद ही हमारी ज़बान खींचकर उस पर माचिस बुझा दी. वो दिन है और आज का दिन, खंडाला तो बहुत दूर की बात है, हम किसी लड़की को अमीनाबाद तक ले जाने का नहीं सोचे.

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अपने साथ तो जो हुआ वो तो बीती बात हो गई, लेकिन कुछ ससुरों की दिमाग़ से आज तक इस फ़िल्म का बुखार कम नहीं हुआ. मतलब, आमिर तो चलती ट्रेन के आगे कूदी मारकर कट लिए, पीछे छोड़ गए असंख्य डेढ़ शाणे, जो हर ट्रेन के आगे यही क़रतब करते फिरते हैं. उसके बाद सीन तो कट होता नहीं, ख़ैर जाने दीजिए... जब ‘रंगीला’ में ख़ुद ही आमिर टपोरीपन में बोल दिए कि ‘जीना हो तो अपुन के जैसे ही जीना’ तो फिर ये चमन होशियार कहां मानने वाले थे. 

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देखिए, बात मैं क्या कर रहा था, और अब क्या ज्ञानपेलुता शुरू कर दी. यही वजह है कि अपन सिर्फ़ परफ़ेक्टली रायता फैला सकते हैं. आमिर जैसा परफ़ेक्शन अपने पास है ही नहीं. भाई तो अपना इतना जबराट है कि उसने अंग्रेज़ों को भी तीन गुना ‘लगान’ की चपत लगा दी था. मने, ‘कचरा’ भी भाई की लीडरशिप में मुथैया मुरलीधरन बन बैठा था. 

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हालांकि, इसके बाद भी आमिर थमे नहीं. ‘गजनी’ में बंदा सब भूल गया, पर परफ़ेक्शन तनिक भी नहीं. मतलब, बाल न ख़राब हों, इसलिए परमानेंट मांग ही निकाल ली. पूरी बॉडी पर यहां-वहां हर जगह दुश्मनों की ठुकाई के लिए गुदाई कर डाली. फ़िल्म देखने के बाद हमें भी ग़ज़ब का जोश चढ़ा था. इतना कि सनीमा हॉल से निकलते ही एक लौंडे को मुक्का जड़ दिए. बस बाद में 10 मिनट तक ऐसा गोदे गए कि आज तक हमारे शरीर पर बरेते छपे हैं.

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लेकिन इत्ते से भी आमिर को चैन नहीं पड़ा, इसीलिए ‘दंगल’ लाकर हमारी ज़िंदगी जंगल बना दी. बॉडी का ऐसा ट्रांसफ़ॉर्मेशन किया कि हमारी गर्लफ़्रेंड हमें भालू समझने लगी. उसका बस चलता ख़ुद शेरनी बनकर हमारे शरीर का सारा एक्स्ट्रा मांस नोच लेती. 

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कुल जमा ये है कि परफ़ेक्शनिस्ट आमिर के चक्कर में हम पूरी ज़िंदगी ‘इडियट’ बने रहे. आज जब ‘चड्ढा’ हटाकर पीछे के हालात देखते हैं, तो बस ‘लाल’ ही नज़र आती है. 

अब भले ही ज़िंदगी में सब ‘ऑल इज वेल’ वाली फ़ीलिंग न हो, फिर भी हम मिस्टर परफ़ेक्शनिस्ट आमिर ख़ान को हैप्पी वाला बर्थडे विश करते हैं. क्योंकि आमिर ख़ान पुरुष नही हैं, बल्कि महापुरुष हैं.