चारों ओर लोग दौड़ लगा रहे थे. साफ़-सफ़ाई चरम पर थी. किचन भी साफ़ और बिना पानी वाली गाढ़ी अरहर दाल बन रही थी. रोटी के फुलके, चटनी और दो तरह की सब्ज़ी बन चुकी थी. ये नज़ारा नेता जी के विधायकी क्षेत्र के एक प्राथमिक विद्यालय का था. यूं तो नेता जी पर्यावरण मंत्री थे, लेकिन आज स्कूल का हालचाल लेने पहुंच गए थे. 

बच्चे भी पहली बार ड्रेस पहनकर स्कूल में आए थे. नेता जी ऐसी व्यवस्था देखकर काफ़ी उत्साहित हो गए. अपने कान के सफ़ेद बालों पर उंगली चलाते हुए उन्होंने बच्चों से सवाल-जवाब करने की हिमाक़त कर दी. कक्षा 4 के लड़के से मुस्कुरा कर पूछ बैठे, बेटा हमें जानते हो? नहीं सर, आपको जानते होते तो आप यहां तक पहुंच न पाते. नेता जी बच्चे के जवाब को मासूमियत समझ आगे एक और सवाल दाग बैठे. 

बेटा हम पर्यावरण मंत्री हैं. जानते हो पर्यावरण मंत्री का क्या काम होता है? हां सर, साल भर जो कठफोड़वा की तरह पेड़ों को काटकर मालामाल होने के जुगाड़ में लगातार प्रयत्नशील रहे, उसे पर्यावरण मंत्री कहते हैं. इस बार नेता जी को बड़ी बेज्जती फ़ील हुई. ग़ुस्सा बहुत आया लेकिन आसपास मीडिया को देख तिलमिलाते हुए डराने के स्वर में बोले. बेटा हम नेता है, जानते हों न नेता कौन लोग होते हैं. 

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बच्चा सच में मासूम था, उसे लगा नेता जी फिर सवाल किए हैं. कहने लगा, नेता बड़ा ही लिबलिबा प्राणी होता है. यूं तो ये दुनियाभर में पाए जाते हैं, लेकिन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बहुतायत में मिलते हैं. भारत में इनकी खाल खासी चिकनी होती है. यही वजह कि ये जनता के हाथ नहीं आते. इनका वैज्ञानिक नाम लैमार है. निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि जो हैपी बड्डे के दिन श्रद्धांजलि सभा संपन्न करा दे, उसे नेता कहते हैं. 

इस बार नेता जी का ग़ुस्सा इतना ज़्यादा भड़क गया कि उनकी 46 की नाज़ुक कमर से ज़्यादा उनका मुंह फूल चुका था. 

शहर के डीएम समेत तमाम आला अधिकारी दरवाज़े के बाहर खड़े-खड़े सूखे जा रहे थे. नेता जी का ख़ास अर्दली बीच-बीच में पानी देता रहता और अंदर का हाल भी सुना देता. 

इत्ते में ही डीएम साहब ने अर्दली को पूछ लिया, अरे श्रीवास्तव जी, मंत्री जी फ़्री नहीं हुए? नहीं सर, वो इस वक़्त ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे हैं, फ़्री होते ही बुलाएंगे. क़रीब आधे घंटे बाद अंदर से आवाज़ आ गई, श्रीवास्तव भेज दो सबको अंदर. सारे अधिकारी बाहर ही चप्पल उतारकर भीतर प्रवेश कर गए. 

आप लोगों को पता है कि 5 जून क़रीब है. पर्यावरण दिवस पर पूरी दुनिया कुछ न कुछ करने की सोच ही रही है. हमें भी कुछ न कुछ करना पड़ेगा. अधिकारियों को समझने में देर न लगी कि बच्चे ने नेता जी का बड़ा वाला काट दिया है. 

‘पिछली सरकार ने पौधारोपण किया था.’ वन विभाग के अधिकारी ने जवाब दिया. 

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‘पिछली सरकार ने एक दिन में कितने पौधे लगाए थे.’ मंत्री जी टेढ़ी नज़र से पूछा. 

‘जी, 10 करोड़ पौधे लगाए थे.’ एक अधिकारी बोला. 

‘गिनीज़ बुक में नाम आया था.’ दूसरा अधिकारी बोला. 

‘पूरे शहर में जगह-जगह प्रोग्राम रखा गया था, सफ़ेद टीशर्ट भी बनवाई था, जिसके पीछे बरग़द का पेड़ छपवाया था.’ तीसरा अधिकारी बोला. 

‘बरगद नहीं, नीम का था.’ वन अधिकारी ने करक्शन किया. 

हम्म... बच्चे की ओर देखते हुए नेता जी बोले, अब हम भी करेंगे. पिछली सरकार से ज़्यादा. हमें बहुत चिंता है. विकास करने के लिए ही जनता ने हमें यहां बैठाया है. इस बार पिछली बार से ज़्यादा पौधे मंगवाइए, ज़्यादा बड़े प्रोग्राम रखवाइए, टीशर्ट के साथ पैंट भी बनवाइए. 

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लेकिन सर बजट? वन विभाग के अधिकारी ने सहमे हुए पूछा. 

नेता जी ने ज़ोर से डांटा, बजट की चिंता मत करो. कम से कम 25 करोड़ पेड़ लगाने है तो क़रीब मान के चलो 1 हज़ार करोड़ लग जाएगा. बाकी प्रोग्राम वगैरह का ऊपर से रख लो. सारा हिसाब नोट कर लो. 

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नेता जी- 600 करोड़ के पौधे आएंगे... 

नोट- 600 करोड़ पार्टी विकास फंड में जाएंगे. 

200 करोड़ प्रोग्राम पर पर खर्च होंगे... 

नोट- 200 करोड़ लड़के के शादी के प्रोग्राम पर खर्चा होंगे. 

100 करोड़ पौधा लगाने वालों को दिए जाएंगे. 

नोट- 100 करोड़ कार्यकर्ताओं में बांटेंगे. 

बाकी 100 करोड़ अगर ज़रूरी हो तो खर्च करना, अगर बच सकें तो बेहतर... 

नोट- 100 करोड़ में ज़रूरत पड़ने पर पौधारोपण होगा. 

देखा बच्चे, पर्यावरण की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता में है. नेता जी फ़ुसफ़ुसाते बोले, आख़िर स्वच्छ हवा नहीं रही तो ये जनता जीएगी कैसे, जीएगी नहीं तो वोट कौन देगा. हां, मगर पौधे लगेंगे कहां? सर वहीं जहां पिछली बार लगे थे. नहीं.. नहीं... ऐसे तो पिछली सरकार के पौधारोपण पर लोग जांच बैठाने की मांग रख देंगे. नैतिकता भी कोई चीज़ होती है. ऐसा करो दूसरी जगहों पर पेड़ उखाड़कर उनकी लकड़ियां बेच दो. उन्हें खड़े-खड़े सड़ ही जाना है. भई जो आपदा को अवसर में बदल न सके और जो अवसर के लिए आपदा पैदा न कर सके, वो नेता कहलाने लायक थोड़ी होता है. 

हां, सर ये सही रहेगा. एक काम हम और भी कर सकते हैं. इन सबके साथ इलाक़े में विशेष सफ़ाई अभियान भी रख लेते हैं. नाले-नालियों की सफ़ाई की जाएगी. साथ में कूड़ा दिखते ही निस्तारण किया जाएगा. नेता जी बच्चे की ओर देखते हुए तुरंत बोले, हां... हां... क्यों नहीं. साफ़-सफ़ाई तो रखनी ही चाहिए, क्यों बच्चे? 

मासूम बच्चा फिर गच्चा खा गया, उसे लगा कि मंत्री जी फिर कुछ पूछे हैं तो बोल पड़ा, ‘लेकिन सर कूड़ा निस्तारण के वक़्त आप का रहना बेहद ज़रूरी होगा. टीवी पर जितना कूड़ा दिखे बेहतर ही है.’ 

Illustrations by- Saloni