21 फ़रवरी 2020. ये वो तारीख़ है, जब हम लखनऊ से दिल्ली कूच करने की तैयारी कर रहे थे. नई नौकरी लगी थी. धड़ाधड़ सामान लपेट रहे थे. कुछ दोस्त भी मदद के लिए आ गए. मुझसे ज़्यादा तो वो साले ख़ुश लग रहे थे. काहे कि अब एक भाई का ठौर दिल्ली जो हो गया था. मन ही मन गदगदियाए जा रहे थे कि चलो साला भाई के पास पहुंच के मदिरापान करेंगे. 

हम भी ख़ुश थे कि अब कुछ नया होगा. नया शहर नए मौके लेकर आएगा. मगर हमें क्या पता था कि दिल्ली बहुत दिल से हमारा काटने को तैयार बैठी थी. शहर ने बोला नहीं पर मैंने सुना, ‘गुरु सुना है लखनवी बड़े नवाबी होते हैं, चलो तुम्हारा बादशाहों के शहर से तार्रुफ़ कराएं.’ 

अभी पहुंचे हफ़्ताभर नहीं हुआ और ख़बर आई कि दिल्ली में हमारा स्वदेशी उत्पाद तगड़े से बढ़ रहा है. कई जगहों पर दंगे भड़क चुके हैं. लेकिन हमारी इस ख़बर से इतनी ज़्यादा धुकधुकाई नहीं थी. भइया यूपी से हैं, ऐसे बवाल बहुत देखे. सही कह रहा हूं अगर दंगों के लिए किसी को जियोग्रॉफिल इंडीकेशन टैग दिया जाएगा, तो हमारा चांस बन सकता है. 

मगर दिल्ली तो हमें यहां बादशाही जंग दिखाने लाई थी, ऐसे कैसे हार मान लेती. भाईसाहब, कोरोना वायरस आ गया. यहां गच्चा खा गए हम. हमको लगा अरे स्वाइन फ्लू या बर्ड फ्लू टाइप का कुछ बीमारी होगा, साला दुई-चार दिन न खाब चिकन-विकन बात ख़त्म. लेकिन नहीं, ये अलग ही बवाल निकला. फिर भी हम डरे नहीं, सोचा सरकार कर ही लेगी कुछ न कुछ. 

सरकार ने किया भी. हमारे प्रिय एकलौते विश्व प्रसिद्ध प्रधानमंत्री जी आए और एक दिन का लॉकडाउन या यूं कहें कि हमारे अरमानों के मरने पर शोक दिवस घोषित कर गए. सही बता रहे अगर कोई ज़रा सा भी दिमाग़दार होता तो अगले ही दिन दिल्ली से चंपत हो लिया होता. लेकिन हम ठहरे लखनवी. हमारे नवाब मुर्गा लड़ाने में व्यस्त रहते थे और हम अपना सूतिया कटवाने में. 

फिर हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी आए और 21 दिन के लॉकडाउन का लिफ़ाफ़ा हमें थमा दिया. बस उसी दिन से कोरोना और हमारी सालों पुरानी बीमारी का इलाज एकसाथ शुरू हो गया. सबका आना-जाना बंद हो गया. न तो खाना बनाने वाला और न ही कपड़े धोने वाला और न ही बर्तन और साफ़-सफ़ाई वाले को ही आने की इजाज़त थी. एक मर्द होने के नाते ये 'औरतों' वाले काम हमने कभी नहीं किए थे. ऐसा नहीं है कि मैं इन कामों को औरतों के काम समझता आया हूं, बस एक मर्द होने के नाते मुझे ये काम कभी करने को मिले ही नहीं. ऐसे में ये मर्दाना संक्रमण बढ़ता ही गया और अब इलाज बेहद ज़रूरी हो गया था. 

मरता क्या न करता, घुस गया किचन में. लेकिन खाना खाने से पहले बनाना पड़ता है और बनाने से पहले बर्तन घिसने होते हैं. कई बार औरतों की कमर दर्द की शिकायत सुनी थी, तब लगता था कि आए दिन कमर कैसे दर्द हो जाती है. आज समझ आ गया, भइया चार बर्तन नहीं घिसे कि कमर पिराए लगी. बस ‘उई मां मर गई रे’ की जगह कुछ और ही मुंह से निकला था. बर्तन साफ़ हुए तो सब्ज़ी, बाकी राशन का जुगाड़ करना पड़ा. मैं अक़्सर सोचता था कि मेरी मां में इतना धीरज क्यों है? जब मैं प्याज़, मसालों को भूनता हूं. तेल के साइड से छूटने तक उसकी आंच में ख़ुद भी जलता हूं. तब पता चलता है कि दुनिया की हर औरत लाख तकलीफ़ों के बाद भी अपना परिवार छोड़कर क्यों नहीं जाती. 

हर रोज़ ऑफ़िस के साथ घर का काम करने के बाद महिला सशक्तिकरण की मर्दाना चालाकी भी उजागर हो गई. 

‘अरे देखिए भाईसाहब हमारी पत्नी तो इंजीनियर है. 60 हज़ार महीना पाती है. सुबह पांच बजे उठती है, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, खाना बनाना, कपड़े धोना और अब तो घर का राशन भी ले आती है. भई हम तो ‘विमन इंपावरमेंट’ वाले हैं. सारे काम औरतों को आने चाहिए, ज़माना बदल चुका है.’ 

मतलब इतनी लम्पटगिरी से औरतों का शोषण शायद ही किसी सदी में हुआ हो, जितना आज इस विमन इंपावरमेंट के नाम पर हमने कर दिया. अपनी शुक्लाइन अब सिर्फ़ घर ही नहीं बल्क़ि शुक्ला जी बैंक बैलेंस भी मेनटेन कर रही है. 

खैर आज मजबूरी में ही सही पर अपने अंदर की शुक्लाइन को ज़िंदा कर रहे हैं. बीमारी सालों पुरानी है जाते-जाते जाएगी. बस अब दवा बराबर लेता रहूंगा. साथ में बर्तन, खाना और कभी-कभी कपड़ा भी धोता रहूंगा.