अंग्रेज़ी बड़ी ही इंटरेस्टिंग लैंग्वेज है. काहे कि ज़्यादतर भारतीयों को आती नहीं है. यही लिए सबका इंटरेस्ट इस पर बना रहता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे मोहल्ले की ख़ूबसूरत शहज़ादी पर चौराहे पर खड़े लखैरे आशिकों का इंटरेस्ट होता है. इतिहास गवाह है कि न उस ख़ूबसूरत मोहतरमा ने कभी इन लखैरों को घास डाली और न ही अंग्रेज़ी ही हम ज़्यादातर भारतीयों से रिलेशनशिप रखना चाहती है. लेकिन ईमान की कसम कोशिश दोनों ही जगह हौक के जारी है.   

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उत्तर भारतीयों के साथ समस्या कुछ ज़्यादा ही है. हम अंग्रेजी बोलने से पहले ही खींसे निपोर देते हैं. फुल कॉन्फिडेंस से किसी को हाऊ आर यू पूछ डालें तो अच्छा-भला आदमी भी यकायक मर जाए. दोष हमारा नहीं बल्क़ि ससुरे नेताओं का है. हिंदी मां है कहकर फुसलाते गए. ये नहीं बताए कि अंग्रेज़ी वो बाप है, जिसके सामने आते ही पतलून टाइट हो जाती है. मने पिता जी जैसे सार्वजनिक बेज्जती का कार्यक्रम चलाते हैं, वैसे ही अंग्रेजी भी दुनियाभर के आगे इज़्ज़त को उधेड़ कर रख देती है. ‘इज़, आर, एम’ की इस बेरहम दुनिया में ‘है, हैं और हूं’ सुनकर रिंकिया के पापा ही नहीं मम्मी भी ‘हींहींहीं’ हांस देती हैं. लेकिन अब पछताए होए क्या ‘वैन बर्ड्स चुग द खेत.’  

हालांकि, इत्ता निराश होने की ज़रूरत भी नहीं है. काहे कि जैसे शरीर की खुझली मिटाने की गारंटी ज़ालिम दवाखाना देता है, वैसे ही अंग्रेज़ी बोलने की खुझली भी चौराहे-नुक्कड़ों पर टंगे विज्ञापनों में दूर की जा रही है. ऐसे-ऐसे विज्ञापन पड़े हैं कि जिन्हें देख अंग्रेज़ी आए या न आए मगर हंस-हंस के आंखों से आंसू ज़रूर टपक पड़ेंगे.   

मतलब इसको ही ले लीजिए, ये ससुरा दिनदहाड़े अंग्रेजी बोलना सिखा रहा है. इस विज्ञापन को आईपीएस पंकज नैन ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘इंग्लिश सिखाएगा या डकैती.’   

अब इस डकैती के बाद ट्विटर पर अंग्रेज़ियत भरे विज्ञापनों की ऐसी बकैती शुरू हुई कि मारे हंसी के जबड़ा पिरा गया. मतलब लौंडों ने कोहराम मचा के रख दिया. अंग्रेज़ी के साथ ही एक से बढ़कर एक जबर दावे पेश किये जाने लगे.

कौन सा विज्ञापन देखकर आप लोगों को ज़्यादा एन्जॉयिंग वाला फीलिंग हुआ है? हमें कमंट्स डिब्बा में ज़रूर बताएं. और अगर आपके भी अगल-बगल खंभा-दीवार पर ऐसे विचित्र विज्ञापन दिए हों तो तुरंत वहां से सॉरी शक्तिमान बोल कट लें.