भारत में जब शादी होती है तो पति अपनी पत्नी को सदा उसकी रक्षा करने का वचन देता है, पर यहीं एक पति ने खुद ही चाकू से अपनी पत्नी पर हमला कर के उसकी नाक काट दी. उसने अपने दिए हर वचन को ताक पर रख कर ऐसी शर्मनाक हरकत सिर्फ दहेज़ के लिए की.

50 हज़ार रूपये के लिए दे दिया उम्र भर का दाग

25 वर्षीय कमलेश से उसका 27 वर्षीय पति संजीव राठोड़ दहेज के रूप में 50 हज़ार रूपये की मांग कर रहा था. कमलेश का परिवार गरीब है इसलिए वो ये रकम उसे नहीं दे सकती थी. उनकी शादी को 8 साल हो चुके हैं, पर आज भी दहेज़ की मांग बंद नहीं हुई है.

8 साल से सह रही थी प्रताड़नाएं

परम्पराओं के अनुसार दहेज़ एक तोहफे की तरह होता है, जो मां-बाप अपनी ख़ुशी से लड़की को देते हैं. पर ये हादसा होने तक हर दिन कमलेश दहेज़ के लिए अपने पति से अलग-अलग प्रताड़नाएं सह रही थी. वो उससे कहती रही कि उसके गरीब मां-बाप उसकी मांगे पूरी करने में सक्षम नहीं हैं. इसके बावजूद वो उसे ऐसा करने की धमकी दिया करता था. सालों से वो अपने पति से पिटती आ रही है, कभी बेल्ट से, कभी चप्पल से, कभी डंडे से उसे पीटा जाता और वो मजबूरी में ये सब सहती रही.

ससुराल वाले भी देते थे पति का साथ

14 सितम्बर को जब वो उसके लिए खाना बना कर लायी, उस दिन उसके पति ने ये शर्मनाक हरकत की, जिसमें पति के घरवालों ने भी उसका पूरा साथ दिया. जब वो चाकू से कमलेश की नाक काट रहा था, तब उसके ससुराल वालों ने उसे पकड़ रखा था.

नाक का कटा हुआ हिस्सा ले गया साथ

कमलेश को अस्पताल तो ले जाया गया, पर उसकी नाक को दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता था. उसकी नाक काटने के बाद संजीव उस कटे हुए हिस्से को अपने साथ ले गया था.

पुलिस अब संजीव और उसके परिवार की तलाश कर रही है. कमलेश के बड़े भाई ने बताया कि उसका पति एक संनकी आदमी है और कमलेश की नाक काटने के बाद वो उसे मंदिर में चढ़ा आया है.

आर्थिक रूप से निर्भर औरतें मजबूरी में सह रही हैं अत्याचार

इस घटना की जितनी निंदा की जाये उतनी कम है पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि दहेज के लिए किसी औरत को प्रताड़ित किया गया हो. जाने कितनी ही औरतें दहेज के लिए आग में झोंक दी गयी हैं. आज भी कई औरतें ये सब सह रही हैं. कमलेश ने भी ये हादसा होने से पहले 8 साल तक लगातार प्रताड़नाएं सहीं, पर वो कभी इस सब से निकल नहीं सकी.

एक आर्थिक रूप से निर्भर औरत के पास खुद पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ ज़्यादा कुछ करने का चारा ही नहीं होता. वो अपने पति को सिर्फ इस डर से सज़ा नहीं दिलाती कि इसके बाद उसे और उसके बच्चों को कौन पालेगा. ये स्थिति बदलने के लिए औरतों को आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा. 'एक दिन सब ठीक हो जाएगा' ये सोच कर हिंसा सहते रहना किसी समस्या का हल नहीं है.

दहेज अब मात्र एक रिवाज़ नहीं रह गया है, इससे जुड़े अपराधिक मामलों का आंकड़ा ये दिखाता है कि ये एक सामाजिक समस्या का रूप ले चुका है. जो दहेज देने में सक्षम हैं, जब वो दहेज देते हैं, तो हर वर्ग के मां-बाप पर एक तरह से दहेज देने का सामाजिक दबाव बनता है.

प्रथा नहीं अभिशाप है दहेज

आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग अपनी बेटियों को दहेज देने के लिए क़र्ज़ लेते हैं, अपनी ज़मीनें तक बेच देते हैं और फिर बाकी की ज़िन्दगी इस क़र्ज़ के बोझ को उतारने में बिता देते हैं. यही कारण है कि कई लोगों को बेटियां आर्थिक बोझ की तरह लगने लगती हैं, उनके पैदा होने के दिन से मां-बाप के दिमाग में ये चलने लगता है कि उनके लिए दहेज़ कैसे जुटाना है.

जब रिवाज़ कुरीति का रूप ले लेते हैं तो उन्हें ख़त्म कर देना ही बेहतर होता है. दहेज एक ऐसी प्रथा है, जो लड़की के लिए ही नहीं, उसके घरवालों के लिए भी अभिशाप बन जाती है.

Source: Metro