इंदिरानगर निवासी 29 वर्षीय महिला ने पुलिस को शिकायत दर्ज करायी कि वह अपने पति से थक चुकी है और अब अलग होना चाहती है, लेकिन तलाक लेने की जो वजह उसने बतायी, वो इतनी आम नहीं है. उसने अपनी शिकायत में कहा है कि एक आईटी कंपनी में काम करने वाला उसका पति, ऑफिस से आने के बाद घर में साड़ी पहनता है, मेक-अप करता है और औरतों जैसी हरकतें करता है. महिला ने ये भी बताया कि उसकी शादी एक साल पहले हुई थी, लेकिन अब तक उनके बीच शारीरिक संबंध नहीं बने. अनीता का पति नवीन भी तलाक के लिए तैयार है.

इस तरह की घटनाओं को असंवेदनशीलता से ख़बर के रूप में पेश तो कर दिया जाता है, पर इन घटनाओं के पीछे की वजह को समझने में अकसर आप और हम आलस कर जाते हैं. ऐसी घटनाओं में आम तौर पर पति को मुजरिम की तरह पेश कर दिया जाता है, आम पुरुष की तरह पेश न आना हालांकि कोई गुनाह नहीं है. नवीन क्यों ऐसा करता था और उसने एक लड़की से शादी क्यों की, ये जानने की कोशिश करना ज़्यादा ज़रूरी है.

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क्यों पसंद है नवीन को लड़कियों की तरह हरकतें करना

पहले बात करते हैं कि नवीन को लड़कियों जैसी हरकतें करना क्यों पसंद था? आम तौर पर भारतीय समाज दो ही तरह के लोगों को सामान्य समझता है, मर्द या औरत. इसके इतर जो भी जेंडर हैं, लोग उनके बारे में ठीक से जानते नहीं है. जो जानते हैं, वो इन्हें नॉर्मल नहीं मानते, या उनसे घृणा करते हैं. ऐसे लोग जिन्हें हम पुरुष या औरत में नहीं बांट सकते, वो गे, ट्रांसजेंडर, लेस्बियन, बाइसेक्सुअल में से कुछ हो सकते हैं. जब ऐसे व्यक्ति से औरत या पुरुष की तरह ज़िन्दगी जीने की अपेक्षा की जाती है, तब इस तरह की घटनाएं होती हैं.

हो सकता है नवीन भी अन्दर से एक पुरुष की तरह महसूस न कर के एक स्त्री जैसा महसूस करता हो, शायद इसीलिए उसे लड़कियों से जुड़ी चीज़ें, जैसे मेक-अप, गहने लुभाते हों, जैसे किसी लड़की को लुभाते हैं. वो एक लड़के से अलग है, ये बात शायद उसके मां-बाप ने भी नोटिस की होगी, पर कई लोगों को लगता है कि शादी करा देने से लड़का 'ठीक' हो जाएगा, आम लड़कों सा व्यवहार करने लगेगा. बस इसीलिए ऐसे लड़कों की शादी किसी लड़की से करा दी जाती है, इस तरह लड़की की भी ज़िन्दगी बर्बाद होती है और लड़के की भी. ये वो समाज है जो गे और हिजड़े में अंतर भी नहीं समझता, बस इतना जानता है कि ये सभी घृणा के पात्र हैं.

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खुद से भी बोलते हैं झूठ

शायद नवीन में भी इतनी हिम्मत न रही हो कि वो खुद अपनी पहचान को समाज के सामने अपना सके, उसे भी आसान लगा होगा एक आम लड़के का भेस बना कर जीते रहना. ये ऐसा विषय है जिसके बारे में अशिक्षितों में ही नहीं पढ़े-लिखों में भी जागरूकता का अभाव है. लोग इसे कोई बीमारी समझते हैं. हम लैंगिक समानता की बात करते हैं, तो वह चर्चा केवल महिला सशक्तिकरण तक ही सीमित रह जाती है, जबकि समलैंगिकों की स्थिति महिलाओं की सामाजिक स्थिति से भी बदतर है.

यही स्थिति प्रिया वेदी जैसी पत्नियों को आत्महत्या की और धकेल देती है. , एम्स अस्पताल के एनेस्थेसिया विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर 31 साल की प्रिया वेदी का शव दिल्ली पुलिस ने 2014 में पहाड़गंज के होटल से बरामद किया. पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला उसमें लिखा था, “मैं समाज के बारे में कुछ याद दिलाना चाहती हूं. पति कमल वेदी के साथ शादी को पांच साल हो गए हैं और अब तक हमारे बीच कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं हैं. एक महीने पहले ही मेरे पति ने माना की वह गे हैं. पिछली रात मेरे पति से मेरा झगड़ा हुआ. मैं परेशान हो कर यह कदम उठा रही हूं.”
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महिलाओं से भी बुरी है इनकी स्थिति

जागरूकता के अभाव में असंवेदनशीलता होना स्वाभाविक है, इसीलिए समाज का नज़रिया बदलने के लिए शिक्षण संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए और पाठ्यक्रम में समलैंगिकता जैसे मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए.

तलाक की नौबत आ रही है, क्योंकि समाज के दबाव में इनकी शादियां की जा रही हैं. ये लड़के के लिए भी बेहद अपमानजनक होता है जब उसकी जेंडर आइडेंटिटी के कारण उसे बदनाम किया जाता है. अन्य जेंडरों के प्रति समाज का जो नज़रिया है, वो कितना सही है, इस पर खुल कर बहस होने की आवश्यकता है.

Source: Timesofindia