डॉक्टर- आपकी पत्नी बस कुछ दिन की मेहमान है, I Am So Sorry.

पति- इसमें सॉरी की क्या बात है, ये कुछ दिन भी कट ही जाएंगे.

इस जैसे कई चुटकुले हमारे WhatsApp में पड़े होंगे, कुछ पर हंसी भी आ जाती है. हंसना अच्छा भी होता. लेकिन ये चुटकुले बुरे हैं. बुराई इनके हास्य रस में नहीं है, बुराई इनकी मानसिकता में है. पति-पत्नी के चुटकुलों की एक शैली होती है. जहां हर पति अपनी पत्नी से त्रस्त है, जहां हर पत्नि अत्यधिक शॉपिंग करने वाली होती है.

इन चुटकुलों ने पति और पत्नी के लिए खांका खींच रखा है. पत्नी की खांके पर लिखा है को वो अपने ससुराल से परेशान रहेगी, मेकअप बहुत करेगी, खाना बुरा बनाएगी, गहनों के लिए मर भी जाएगी, पति पर शक़ करेगी आदी. पतियों के खांके पर लिखा है, शराब पियेगा, पत्नी से परेशान रहेगा, साली के साथ फ़्लर्ट करेगा आदी.

इन चुटकुलों की समस्या ये है कि इनसे एक ख़ास किस्म का स्टीरियोटाइप मज़बूत होता है. जो महिलाओं के ख़िलाफ़ भी है और पुरुषों के भी. ज़्यादातर महिलाओं के ही, इससे ये मानसिकता बनती है कि महिलाएं सिर्फ़ पैसे की पीछे भागती हैं, उनके ज़िंदगी का इकलौता मक़सद ख़ूबसूरत दिखना है, अपने फ़ायदे के लिए घर को तोड़ती हैं. पति-पत्नी के चुटकुलों से महिलाओं का ऐसा ही चरित्र-चित्रण होता है.

उन लोगों के मुंह से भी ऐसे स्त्री-विरोधी चुटकुले सुने जा सकते हैं, जिन्हें हम प्रगतिवादी मानते हैं. कई लोग इस समस्या को महज़ चुटकुला समझ कर ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर सुनने वाला स्त्री विरोधी बनता जाता है. तह दर तह उसकी सोच पर इन चुटकुलों से निकली मानसिकता हावी होती जाती है.

इस महिलाविरोधी स्टीरियोटाइप को और मजबूत करती है कुछ अन्य प्रकार की स्टीरियोटाइप. जैसे 'एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है', 'त्रिया चरित्रं देवम न जानम', 'महिलाओं को झूठी तारीफ़ पसंद होती है', 'औरतें किचन में अच्छी लगती हैं' इत्यादी.

इन छोटी-छोटी बातों के बीच में इस कदर महिला विरोध रचा-बसा है जिसे अब सामान्य आखों से देख पाना मुश्किल हो गया है. समाज इसे सामान्य रूप में स्वीकार कर चुका है. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे द्वारे लिखी गईं कुछ बातों में भी ये विसंगती मौजूद हो लेकिन हम अपनी भूल को सुधारने की दिशा में हमेशा प्रयत्नरत रहते हैं.