सुबह की चाय बनाई ही थी कि फोन की घंटी बजी. बाबा का फोन... बाबा सुबह कॉल करते हैं, अच्छा लगता है, दिन भी अच्छा गुज़रता है.

'शुभो नोबोबोरशो बेटा', कुछ ऐसा कहा बाबा ने. याद आया आज नए साल का पहला दिन है. 1 जनवरी को नए साल का जश्न मनाने के आदि लोगों को वैसे भी अपना देसी कैलेंडर याद नहीं रहता. 'आपको भी', कहकर मैंने फोन रख दिया. पर मेरा ध्यान तो उंगलियों के बीच से निकलते धुंए और Railing पर रखे चाय के कप से मीलों दूर था. ध्यान तब आया जब उंगलियां जलने लगी.

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बनाने वाले ने बनाने से पहले मेरा अच्छा खासा Intro सोच रखा था, ये मैं नहीं जानती थी. ईश्वर की असीम कृपा से मेरा जन्म ओडिशा में हुआ. पिता जी की नौकरी की बलिहारी, स्कूल की पढ़ाई बिहार के बेगुसराय जिले से. जिस जगह का नाम सुनकर अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है. उसके बाद तो ये भ्रमण का सिलसिला चलता ही रहा. योगी के देश(उत्तर प्रदेश) से लेकर हिन्दुस्तान के दिल तक(मध्य प्रदेश) का सफ़र बड़ा ही सुहाना था. पर इतने लंबे सफ़र में कब मैं अपनी ही संस्कृति से दूर होती चली गई, पता ही नहीं चला.

जब भी कोई त्यौहार आता है, मुझे फिर से वो सब महसूस होने लगता है, जिससे मैं न जाने कब से भाग रही थी. मुझे अपने नाम और संस्कृति से जुड़ा कोई भी त्यौहार पसंद नहीं है. मैं नास्तिक नहीं हूं और न मुझे त्यौहार मनाने से परहेज़ है, पर इन उड़ते-फिरते ख़्यालों का क्या करूं, जो किसी भी वक़्त दिमाग को घेर लेते हैं.

पोइला बोइसाख, यानि नए साल का पहला दिन. लाल पाड़ वाली सफ़ेद साड़ी और आल्ते से रंगीन पांव, इस Attire में अकसर देखा है लड़कियों और महिलाओं को. लोगों को ख़ुश देखकर ख़ुशी तो होती है. ऐसे ही किसी समूह में खुद को ढूंढने की कोशिश भी की है, कई बार की है. उस ख़ुशी से सराबोर समूह में घर के सब लोग दिख जाते हैं, पर मैं ख़ुद को ख़ोज नहीं पाती.

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इतना जानती हूं कि मां काली के सामने सफ़ेद साड़ी में शंख फूंकते हुए मैंने ख़ुद को कभी नहीं देखा. न ही खुद को बड़ी सी लाल बिंदी में देखा है. पर फिर भी मैं बंगाली हूं. मुझे ढाक की आवाज़ भी उतनी ही पसंद है, जितना कि ढोल. क्योंकि दोनों पर ही Dance करने का मौक़ा मिल जाता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं. जैसे कि दूसरे Non Resident Bengali के साथ होता है, मैं कभी भी त्यौहारों के मौके पर Nostalgia महसूस नहीं करती.

एक बार कुछ दोस्तों ने मुझे किसी बंगाली Association के पूजा-मिलन Function में चलने को कहा था. वहां पहुंचकर ये देखा कि सब Proper Bengali Attire में पहुंचे थे और मैं Jeans aur Black T-shirt में. किसी ने मुझे वहां से निकाला नहीं, पर लोगों की घूरती निगाहें ही बहुत कुछ कह रही थी. ऐसी न जाने कितनी ही घटनाएं और यादें जुड़ी हैं इन सब त्यौहारों से.

आप सबने अगर यहां तक पढ़ने की ज़हमत उठाई है, तो आप शायद मेरी बात थोड़ी-बहुत तो समझ ही गए होंगे. भारत में जश्न हो या शोक़, हर मौके के लिए हमारे पास गीत सुरक्षित हैं. पर मैं अपने 'वहां' के त्यौहारों से जुड़े गीतों से ख़ुद को जोड़ नहीं पाती. 2 दिन पहले बैसाखी थी और मोहल्ले में बज रहे गीत मुझे अच्छे लग रहे थे. पर दुर्गा पूजा या पोएला बौइसाख से जुड़ा मुझे कोई भी बांग्ला गीत याद तक नहीं है. दोष मेरा ही है, मेरी Upbringing का नहीं, मैंने ही शायद ख़ुद को इन सबसे नहीं जोड़ा.

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मुझे ये अपने नहीं लगते. इस तरह की बात कह देना, बहुत बड़ा गुनाह है, पर जो है सो है. जब भी किसी त्यौहार का ज़िक्र होता है, तो मैं उससे जुड़ा हुआ महसूस नहीं करती. ये क्यों है, पता नहीं. बचपन से ही मां-बाबा ने अपनी भाषा से जोड़ने की हर संभव कोशिश की. मुझे बांग्ला भाषा बहुत पसंद है, जब भी किसी को बांग्ला में बात करते सुनती हूं, एक दफ़ा घर याद आ जाता है. गांव गए हुए भी कई साल बीत गए हैं. पर सबसे मज़ेदार बात यह है कि कहीं भी वो अपनापन नहीं मिलता और हर जगह लोग मेहमानों के जैसे पेश आते हैं.

रवींद्रनाथ की कहानी 'काबुलीवाला' से ख़ासा लगाव है. काबुलीवाले को भी अपने वतन पहुंचने की आस रहती है. उसमें और मुझमें बस इतना अंतर है कि मैं अपने वतन में ही हूं, पर अपनी संस्कृति से दूर हूं. इतनी दूर कि अब ये दूरी कभी ख़त्म नहीं हो सकती. ये कभी न मिटने वाली दूरी को मैं ख़त्म नहीं करना चाहती, या फिर शायद मैं कर ही नहीं पाऊंगी.

आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबासी... ये बांग्लादेश का राष्ट्रगान है, पर भारत में भी बिना किसी आपत्ति के लोग इसे गुनगुनाते हैं. बड़ा ही अच्छा गाना है, वतनपरस्ती की खुशबू आती है. पर इसका मतलब ये नहीं की मैं बांग्लादेशी हूं. तो फ़िर नाम और संस्कृति से इंसान को क्यों जोड़ा जाता है?

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कोई भी त्यौहार ख़ुशी का मौका है, सच है, पर मेरे लिए हर दिन एक त्यौहार ही है. जिस दिन कुछ अच्छा कर दिया, उस दिन हो गया बड़ा त्यौहार. किसी के चेहरे की मुस्कुराहट की वजह बन पाना त्यौहारों के गीत जैसा ही तो है. अपना-अपना नज़रिया है. आज नए साल का पहला दिन है, और साल की शुरुआत अच्छी होनी चाहिए, तो ये सच बयां करके साल की शुरुआत की है. उम्मीद है ये साल भी अच्छे से बीतेगा. आप भी कुछ ऐसा करें, जो आप कई दिनों, कई महीनों और कई सालों से करने की सोच रहे थे, पर कर नहीं पा रहे थे.