मैं शायद इसलिए बची हुई हूं, क्योंकि मुझे छोड़ दिया गया.

पहले ऑटो वाले, कैब वाले से उनके बारे में पूछ लिया करती थी, अब बैठती भी हूं, तो ड्राईवर सीट की Opposite वाली सीट पर, ताकि वो शीशे में मुझे न देख सकें.

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रेप, मर्डर, Stalk करने, एसिड फेंकने की जितनी ख़बरें सामने आती हैं, उस महिला के लिए बुरा लगता है, गुस्सा आता है उन अपराधियों की हरकत पर. फिर ज़ेहन में एक सवाल कहीं चुपके से बैठ जाता है. ये सवाल दिन में नहीं खटखटाता, ये सवाल रात में सिरहाने से चूंटी मारते हुए आता है. ये वो सवाल है, जो रोज़ मुझे परेशान करता है, शायद मेरे जैसी हर लड़की के दिमाग़ में घर बना कर बैठा हो ये सवाल. क्या करें, पुरुष है न ये 'सवाल', इसलिए सिर्फ़ एक लड़की पर नहीं रुकता, 10-15 के दिमाग़ को तो तंग करता ही होगा.

मेरे साथ कुछ ग़लत नहीं हुआ. इसलिए नहीं कि मैं सुरक्षित थी, बल्कि मुझे छोड़ दिया गया

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हर बार ये बात खटकती है कि जिन भी महिलाओं/लड़कियों के साथ ये सब हुआ, उनमें और मुझमें सिर्फ़ एक फ़र्क था कि उन्हें Choose किया और मुझे छोड़ दिया गया.

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History की किताबों में पढ़ा था कि पहले जो राज्य के अपराधी या Slaves होते थे, उन्हें जानवरों से लड़ने के लिए उतारा जाता था. एक दिन एक की बारी आती, एक दिन एक की, लेकिन मरते सब थे. कुछ-कुछ इसलिए बच जाते थे, क्योंकि उन्हें छोड़ दिया जाता था, इसलिए नहीं कि उनकी किस्मत अच्छी थी. इस समाज में औरत की स्थिति उन Slaves जैसी ही है.

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सामने से गुज़रते हर उस आदमी की आंखों में मुझे Privilege दिखता है. उसकी आंखें कहती हैं, 'जा तुझे छोड़ दिया, आज तेरी जगह किसी और की बारी है. आज किसी और की मां रात भर खुली आंखों से अपनी बेटी के आने का इंतज़ार करेगी... आज किसी और का बाप पुलिस स्टेशन के चक्कर काटेगा... आज वो कोई और हमारे सामने पेश होगी...'

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भारत में हर सेकंड कोई महिला किसी क्राइम का शिकार बनती है. कभी वो सड़कों से उठा ली जाती है, कभी उसकी 'न' के बदले उस पर एसिड फेंक कर उसे धरातल पर उतारा जाता है. कभी उसका पति उसकी कैंची सी चलती ज़बान को काटता है और कभी-कभी तो बाप ही बेटी को प्रेग्नेंट कर, उसे इस दुनिया में उसकी औकात के बारे में बताता है.

ये सभी घटनाएं हर उस औरत के लिए Notice Board पर लिखे मेसेज की तरह हैं, जो कहता है कि अगर तू ठीक-ठाक है, तो इसे अपनी किस्मत मत समझना. हमने तुझे जीने का मौका दिया है. जिस भी औरत ने पति की मार खाए बिना, कोई ऊंच-नीच हुए बिना अपनी ज़िन्दगी काट ली है, उसे शुक्र मनाना चाहिए आदमियों का कि उन्होंने उसे ऐसे जीने दिया.

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कभी अपने मोहल्ले के लड़के को अकेले चलते हुए देखा है? कितना Confidence होता है उसकी चाल में. उसके Gestures बता देते हैं कि बेटा यहां हाथ तो लगा कर दिखा, ये मेरा इलाका है.

कभी किसी लड़की को देखा है उसके मोहल्ले में चलते हुए? उसकी आंखों में एक अजीब सा भारीपन होता है. न तो उसकी चाल में वो Confidence होता है, न ही वो ये दावा कर सकती है कि उसके इलाके में उसे कोई छेड़ नहीं सकता.

मां-बाप ने सिखाया है कि घरवालों के अलावा किसी तीसरे आदमी पर भरोसा मत करना, लेकिन मैं तो घर आने तक हर उस इंसान पर भरोसा करती हूं, जो मुझे सड़क पर दिखता है. एक अजीब सा भरोसा होता है कि अगर कुछ हुआ तो ये लोग बचाने तो आएंगे ही. कई बार कोई आदमी देर तक पीछे-पीछे चलता है, तो रोड के दूसरी साइड चली जाती हूं कि कहीं ये कुछ कर न दे.

हर लड़की ख़ुद को Safe लेकर चलती है, कोई लड़की आधी रात को खाली सड़क पर खड़ी हो कर ये नहीं कहती कि आओ मेरा बलात्कार करो. लेकिन बलात्कार तो दिन में भी होते हैं, भरी सड़क में उसे गोली मार दी जाती है, Office के नीचे से उसे उठा लिया जाता है. तब कहां जाती है Safety? जिस लड़की या महिला के साथ ऐसा होता है, उसे हम दुर्भाग्यपूर्ण कह देते हैं. किसी की करतूत को भाग्य पर डाल देते हैं कि बेचारी की किस्मत ख़राब थी. ये कभी नहीं कहते कि दोष उसकी किस्मत का नहीं, उन गुनेहगारों का था.

रोज़ होते गैंगरेप, मर्डर और लड़कियों के साथ होती घटनाओं के बाद दिमाग़ में घूम-फिर कर एक ही बात आती है, मुझे आज तक कुछ इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि मुझे छोड़ दिया गया.

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