फरवरी, 2018. 21वीं सदी का 18वां वर्ष चल रहा है. 20वीं सदी के आख़िरी 10 सालों से लेकर अब तक टेक्नॉलिजी ने क्या जबर छलांग लगाई है, नहीं? कहां पहले हफ़्तों बाद कोई ख़बर मिलती थी और कहां अब चंद पल भी नहीं लगते. कहां पहले कोई ख़ुशख़बरी के लिए बेचैनी से ख़त का इंतज़ार करते थे, कहां अब मिनटों में दुनिया के कोने-कोने में बैठे रिश्तेदारों तक न्यूज़ पहुंच जाती है.

मुझे धरती पर अभी 25 साल भी नहीं हुए हैं, बोले तो लेट 90s Kid हूं. बचपन से ही बाबा ने पढ़ने की आदत डलवाई थी और लिखने की आदत मैंने ख़ुद ही लगा ली.

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बचपन में काफ़ी शरारतें कीं, कभी बाबा-मां नाराज़ होते कभी यूं ही जाने देते. लेकिन जब कभी नाराज़गी के कारण बातचीत बंद हो जाती, तो मैं उन्हें मनाने के लिए छोटे-छोटे नोट रखती. वो भी बड़ी क्रिएटिविटी से. मान लो मां ने रात में डांट लगाई और बात बंद कर दी, तो मैं उनके सोने के बाद बड़ी सफ़ाई से रसोई में जाती और दूध के बरतन के ऊपर नोट रख देती, अदरक के सहारे.ये छोटी-छोटी बातें उसे मनाने में बड़ी कारगर साबित होती. अभी याद करके हंसी आ जाती है.

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बचपन में दादाजी को भी कलम से गंदी लिखावट में भी बहुत सारे पोस्टकार्ड भेजती. दादाजी अब नहीं हैं, लेकिन मेरे सारे पोस्टकार्ड्स उन्होंने अपने पास संभालकर रखे थे. ये बाद में बाबा ने ही बताया. दूसरे शहरों में पढ़ने और नौकरीपेशा Cousins को भी पोस्टकार्ड्स और Inland Letter भेजा करती, ये आदत बन गई थी.

फिर वो टाटा-इंडिकॉम वाले बेसिक फ़ोन आ गये और चिट्ठियों का चलन जाता रहा. बाबा फिर भी मुझे चिट्ठियां लिखने को कहते. वो कहते लिखो, पोस्ट करो न करो लिखना मत छोड़ना. और ये आदत बन गई.

स्कूल में पढ़ाई कठिन हुई तो ये आदत कहीं खो सी गई. पर हम दोस्त लोग आपस में ग्रीटिंग कार्ड्स को एक्सचेंज करते ही थे. स्कूल के दिनों में Love Letters एक्सचेंज का भी तो दौर था.

स्कूल से कॉलेज तक के सफ़र में संचार के इतने साधनों के बीच रिश्तों में नज़दीकियां तो बढ़ी, अगर कुछ दूर हुआ, वो था ख़त. पर ख़त से इतनी सारी यादें जुड़ी थी कि उन्हें लिखे या पढ़े बिना एक अलग बेचैनी होती.

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पर करते भी क्या? खाली दिमाग़ शैतान का घर, कॉलेज में एक काफ़ी अजीब काम किया. साथ में पढ़ने वाली कुछ लड़कियों को Love Notes लिखने में मदद की. हंसने की बात तो है, पर किया.

कहने का मतलब है किसी भी कारण से ख़त लिखना जारी रहा, फ़ोन और Whats App के ज़माने में भी. मेरी इस आदत पर मुझे कुछ लोग यहां तक कहते हैं कि तुम ग़लत सदी में पैदा हो गई हो, तुम्हें 19वीं सदी में पैदा होना था! आज के ज़माने में ख़त कौन लिखता है?

ख़त लिखने में जितना वक़्त लगता है उससे कहीं ज़्यादा उसमें भावनायें जुड़ी होती हैं. जो भी महसूस करते हों, उसे शब्द और वाक्यों में पिरोना आसान नहीं. बोलना तो आसान है, लेकिन लिखना मुश्किल. पर कोरे कागज़ पर स्याही की कुछ बूंदें ही कमाल कर देती हैं. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे ख़ुद के बारे में पढ़ना पसंद न हो.

मैं Whats App, Video Calls के दौर में भी ख़त लिखना ज़्यादा पसंद करती हूं. न सिर्फ़ इससे सुकून मिलता है, पर जिसके लिए लिखो, उसके चेहरे पर लंबी-सी मुस्कान भी खिंच जाती है.

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अगर कभी कहीं जाना होता है और घरवाले सो रहे होते हैं तो मैं छोटे-छोटे नोट्स लिख जाती हूं. WhatsApp भी किया जा सकता है, पर रसोई में चाय के कप के नीचे एक छोटी सी चिट अलग एहसास देती है.

चिट्ठियों की तरफ़ करें रुख़-

अगर आपने यहां तक पढ़ने की हिम्मत की है, तो एक छोटी सी हिदायत आपके लिए भी. चिट्ठियां लिखना शुरू कीजिये. शुरू-शुरू में काफ़ी दिक्कतें आयेंगी, शब्द कम पड़ेंगे, खीज भी होगी. पर एक Paragraph ही सही लिखना शुरू तो कीजिये. लंबे-लंबे Whats App Messages Type किए ही होंगे. एक-आध Paragraph कागज़ पर ही लिख कर देखिये. अगर लिखना फिर भी मुश्किल लगे, तो छोटी-छोटी Drawings भी कर सकते हैं.

अगर आप आज भी ख़त लिखते हैं तो बहुत अच्छा! लेकिन अगर SMS और Video Calls के बीच ख़त कहीं छूट गये हैं, तो वापस लिखना शुरू करें.

सप्रेम,

संचिता