सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को आपराधिक दायरे से बाहर कर दिया है. इस निर्णय के साथ ही कई भारतीयों को अपने वजूद का एहसास हो रहा है. 1947 में देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिल गई थी लेकिन LGBTQ समुदाय के लोग अब संवैधानिक आज़ादी मिली है.

ये लड़ाई इतनी आसान नहीं थी. कई लोगों ने अपनी जान गंवाई, तो कई लोगों को समाज और परिवार का रोष झेलना पड़ा.

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय की सोशल मीडिया पर सराहना की जा रही है. इसी बीच एक 25 वर्षीय युवक ने फ़ेसबुक पर ये तस्वीर डाली और एक पोस्ट लिखा, जो सीधे दिल की तारों को छूता है.

Source: Facebook

पोस्ट के कुछ अंश यहां पेश कर रहे हैं:

'I am so Gay Today (Literally & Figuratively). अब मैं एक अपराधी नहीं हूं. मेरी आप सभी से एक गुज़ारिश है कि इस पोस्ट को ज़्यादा से ज़्यादा बेझिझक शेयर कीजिए. अगर आप झिझक महसूस करेंगे, तो इसमें हम सभी की हार होगी.

Sexuality मेरी पहचान, मेरे वजूद का हिस्सा है. 2 साल पहले मेरी ज़िन्दगी कुछ ऐसी थी, जिसमें एक आज़ाद पंछी की तरह नहीं जी रहा था. मेरे अंदर एक कशमकश थी. धीरे-धीरे मैंने अपने दिमाग़ में चल रहे द्वंद को शांत किया. लोगों से मिला और मुझे पता चला कि ऐसे और लोग भी हैं, जो मेरे जैसा ही महसूस करते हैं. मैंने अपने Best Friend Nikhil को उसके जन्मदिन पर अपने बारे में बताया. सच बताने के बाद ही मेरी ज़िन्दगी बदल गई. इसके बाद मैंने अपने भाईयों को बताया और उनके रवैये ने दिल को छू लिया. मेरे माता-पिता Conservative Surrounding (पारम्परिक परिवेश) में रहते हैं और मैं उन्हें तकलीफ़ नहीं देना चाहता था. मैं ये भी नहीं चाहता था कि मेरी Sexuality की वजह से उन्हें ताने सुनने पड़े. मुझे ये बात अपने अंदर रखने में भी तकलीफ़ हो रही थी. मैंने वक़्त लिया और हिम्मत जुटाकर अपने माता-पिता को बताया. मैं क़िस्मतवाला हूं कि उनका Reaction Negative नहीं था. लेकिन उनके दूसरे Doubts थे (Impotency, Erectile Dysfunction). यही सब, समाज के हिसाब से ये सारी बातें किसी भी पुरुष को नंपुसक बनाती हैं. उन्हें वक़्त चाहिए था और मैंने उनकी सुरक्षा के लिए दुनिया के सामने अपनी सच्चाई नहीं रखी.

आज जब मैं घर पहुंचा, तो मेरे पिता ने मुझे गले लगाया और कहा, 'मुबारक़ हो, बेटा अब ये ग़ैरक़ानूनी नहीं है.'

मुझे पता चला कि मेरी मां, अपने आस-पास के लोगों को इस बारे में बता रही थीं. मेरे पिता सरकारी कर्मचारी हैं और इस कारण वो मेरे लिए लड़ नहीं सकते थे. 6/9 के इस ऐतिहासिक दिन पर मेरे माता-पिता काफ़ी ख़ुश हैं. मेरी मां ने मुझ से कहा, 'जाओ सबको बता दो. अच्छा है, अब कोई लड़की का रिश्ता लेकर नहीं आएगा.'

ये तो बस शुरुआत है, रास्ता काफ़ी लंबा है. हमें एक ऐसे मक़ाम तक पहुंचना है, जब भारत में समलैंगिक विवाह मान्य हों. हमें Sympathy नहीं बल्की, एक सुरक्षित और दोस्ताना समाज चाहिए.'

अगर कोई LGBTQ समुदाय का व्यक्ति किसी समस्या से जूझ रहा है, तो उसके लिए इस पोस्ट में अर्नब ने अपना नंबर और ई-मेल आईडी भी दिया है.

आज़ादी का ये जश्न सभी को मुबाऱक हो!