जंग के मैदान से ले कर आतंकियों से निपटने के लिए सेना हर समय तैयार रहती है. ऐसे में सेना का हाईटेक होना बहुत ज़रूरी भी है, जिसके लिए सरकार तरह-तरह के इलेक्ट्रॉनिक सामान सेना को मुहैया कराती रहती है. इन हाईटेक चीज़ों में हथियारों के साथ-साथ बुलेटप्रूफ़ जैकेट और हेलमेट का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है. जवानों की रक्षा के लिए बनाये जाने वाले बुलेटप्रूफ़ जैकेट को जिस तरह से बनाया जाता है, वो बेहद ख़ास है. आज हम आपको इससे जुड़ी कुछ ख़ास जानकारियां देने जा रहे है.

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भारत में इन दिनों बहुत-सी कंपनियां सेना के लिए बुलेटप्रूफ़ जैकेट तैयार कर रही हैं. देखा जाए तो इस जैकेट में दो लेयर होती हैं. इसमें सबसे ऊपर एक सैरेमिक लेयर लगाई जाती है, जिसके बाद बैलेस्टिक लेयर का इस्तेमाल किया जाता है. ज़्यादातर इन लेयर्स को बनाने में Aramid Fibers का इस्तेमाल होता है. इन दोनों लेयर्स को मिला कर ही जैकेट तैयार होती है.

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आखिर ये जवानों की रक्षा कैसे करती है?

जब कोई गोली बुलेटप्रूफ़ जैकेट से टकराती है, तो सबसे पहले वो सैरेमिक लेयर से टकराती है, जिससे गोली का नुकीला सिरा टुकड़ों में टूट जाता है. इसके चलते ना सिर्फ़ गोली का फ़ोर्स कम हो जाता है, बल्कि इससे नुकसान की भी आशंका कम हो जाती है. दरअसल, सैरेमिक लेयर के टूटने के बाद से जो ऊर्जा निकलती है, उसे बैलेस्टिक लेयर सोख लेती है, जिससे बुलेटप्रूफ़ जैकेट पहना सैनिक गोली के प्रभाव से बच जाता है.

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किन-किन चीज़ों से मिल कर बनती है एक बुलेटप्रूफ़ जैकेट?

बुलेटप्रूफ़ जैकेट बनाने में Kevlar एक कॉमन मैटेरियल होता है. इस मैटेरियल से बनी जैकेट और हेलमेट को 'Kevlar जैकेट या हेलमेट' कहा जाता है. इसके अलावा इसे बनाने में Vectrain नाम के एक मैटेरियल का भी इस्तेमाल किया जाता है. Vectrain मैटेरियल केवलर से ज़्यादा उपयोगी माना जाता है और स्टील की तुलना में 5 से 10 गुना मज़बूत होता है.

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क्वालिटी के हिसाब से बुलेटप्रूफ़ जैकेट की कीमत अलग-अलग होती है. सामान्य तौर पर एक जैकेट की कीमत 35,000 रुपये से अधिकतम दो लाख रुपये तक होती है. इसका वज़न मात्र 2.2 किलोग्राम होता है, जिसे आसानी से पहना जा सकता है.

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