लिखने वाले ने कुछ सोचकर ही लिखा होगा "युद्ध के समय भगवान और सैनिक, हमें प्यारे हैं. लेकिन शांति के समय और जब सब ठीक हो, भगवान भुला दिए जाते हैं और सैनिक भी."

एक समय था, जब युद्ध या आपातकाल के समय सेनाप्रमुख भी घटना स्थल पर मौजूद रहते थे. मगर 1976 के बाद कोई भी अफ़सर नहीं गए. इसे आप देश की विडंबना ही कह सकते हैं. सीमा पर गोली खाने वाले सैनिकों को मामूली सुविधा मिलती है, मगर एसी कमरे में बैठने वाले अफ़सर को अधिक सुविधाएं मिलती हैं. इस मुद्दे पर सैनिक विरोध भी दर्ज करवा चुके हैं. हालांकि, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इसका समाधान जल्द ही देने की बात कर रहे हैं. माना जा रहा है कि सैनिकों के साथ अब भेदभाव नहीं किया जाएगा.

Source: Indian Army

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. विश्व में इसकी अपनी एक पहचान है. देखा जाए, तो भारत आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रुप से इतना सशक्त है कि वो अपनी नियति तय कर सकता है. मगर वर्तमान की स्थिति देखने से पता चलता है कि अभी भी हमारे अंदर बहुत कमियां हैं, जिनमें सुधार लाने की ज़रुरत है. इसमें कोई शक नहीं है कि फौज इस देश की ताक़त है. इनकी बहादुरी और दरियादिली के कारण ही हिन्दुस्तान सुरक्षित है. देशवासी अपनी फौज पर गर्व करते हैं. लेकिन कुछ घटना के बाद भारत में सेना के प्रति सम्मान घट रहा है.

दुख में सेना, बाढ़ में सेना, भूकंप में सेना, आपातकाल में सेना और सीमा पर सेना, मगर देश में सेना का सम्मान कहां है? आख़िर सेना के प्रति हमारा सम्मान क्यों घट रहा है? जबकि, सेना अपना काम बख़ूबी निभा रही है. एक तर्क ये दिया जा सकता है कि इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं. हो सकता है कि ये तर्क कुछ मायने में सही भी हों.

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भारतीय सेना आज़ादी से पहले ही अस्तित्व में थी. अंग्रेज़ हिन्दुस्तानियों को ही सेना में भर्ती कर हुकूमत करते थे. आज़ादी के बाद सेना को भारतवर्ष में मिला लिया गया. यूं तो देश में सभी मामलों के लिए अलग से कानून बना हुआ है, मगर भारत में भी स्पष्ट संवैधानिक निर्देश के अभाव में यह विवादास्पद है कि फौजी कानून की घोषणा का अधिकारी कौन है? इस कारण सेना को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

पहली समस्या- सेना प्रमुख कौन?

संविधान के अनुसार, भारत के तीनों सेनाओं का प्रमुख राष्ट्रपति होता है, पर हक़ीकत ये है कि तीनों सेनाओं के प्रमुख होते हैं.

दूसरी समस्या- सेना जनता की या राष्ट्र की?

संविधान के अनुसार, सेना पर अधिकार राज्य (State) का होता है, जो जनता की हिफाज़त के लिए सीमा पर तैनात होती है. हालांकि, आजकल सेना को पुलिस का काम करना पड़ रहा है.

तीसरी समस्या- सेना की बहादुरी पर नेताओं की वाहवाही

वर्तमान में सर्जिकल स्ट्राइक पर जिस तरह से नेताओं ने राजनीति की है, उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि नेता सेना का भी राजनीतिकरण कर रहे हैं, जो देश के लिए सही नहीं है. लोग, अब सेना को भी संदेह की नज़रों से देखने लगे हैं.

कुछ ऐसे कानून, जो सेना पर कलंक है

आफ्सपा (AFSPA) यानि Armed Force Special Power Act एक फ़ौजी क़ानून है, जिसे 1946 में अंग्रेज़ों द्वारा पारित किया गया था. आमतौर पर इस कानून को ‘अशांत’ क्षेत्रों में लागू किया जाता है. यह क़ानून सुरक्षाबलों और सेना को कुछ विशेष अधिकार देता है, जो आमतौर पर सिविल कानूनों में वैध नहीं माने जाते.

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संविधान बनने के बाद देश के पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रहे अलगाववाद, हिंसा और विदेशी आक्रमणों से निपटने के लिए AFSPA को मणिपुर और असम में वर्ष 1958 में लागू किया गया, जो अब तक जारी है. कुछ समय के लिए पंजाब और कश्मीर में भी इसे लागू किया गया था.

कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि इस कानून की आड़ में सेना कई असंवैधानिक कार्य करती है, जिनमें बलात्कार शामिल है. हालांकि, विशेषाधिकार के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है ' सेना विशेषाधिकार कानून का बेज़ा इस्तेमाल नहीं कर सकतीं.'

कुछ ऐसी मांगे, जो ज़रुरी हैं

अभी हाल में ही हरियाणा के रहने वाले एक पूर्व सैनिक ने वन रैंक वन पेंशन की मांग करते हुए ज़हर खा लिया था. इस घटना में सैनिक की मौत हो गई, मगर कुछ सवालों के साथ. सैनिकों की यह मांग सदियों से चली आ रही है, जिसे सरकार नज़रअंदाज़ कर रही है.

सेना का बाज़ारीकरण, व्यापारीकरण और राजनीतिकरण हो रहा है. इस बात को भले ही आप और हम ना समझें, मगर यह हक़ीकत है. भारत में सेना के ऊपर जीडीपी का 10 प्रतिशत ख़र्च किया जाता है, मगर उनकी आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ करके.