शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा

कभी वह दिन भी आयेगा जब अपना राज देखेंगे

जब अपनी ही जमीं होगी जब अपना आसमां होगा

जगदंबा प्रसाद मिश्र हितैषी की ये पंक्तियां देश पर अपने प्राण न्योछावर करने वाले जांबाज़ सिपाहियों और क्रांतिकारियों की कुर्बानियों की याद दिलाती हैं. आज हम एक ऐसे ही जांबाज़ सिपाही की बहादुरी की कहानी से आपको रू-ब-रू कराने जा रहे हैं, जिसने 1999 कारगिल युद्ध में अपनी जान कुर्बान कर दी और सदा-सदा के लिए अमर हो गए.

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देश के इस वीर जवान का नाम है कैप्टन हनीफ़ उद्दीन और केवल 25 साल की उम्र में इस बहादुर योद्धा ने इंडो-पाक बॉर्डर पर स्थित टुर्टुक में अपने सीने पर दुश्मन की कई गोलियां खाई, लेकिन दुश्मन को भारत की धरती पर कदम नहीं रखने दिया. एक सिंगल मदर के प्यार और परवरिश में पले-बढ़े हनीफ़ की कहानी बहुत ही कम लोगों को पता होगी और जो जानते होंगे वो इस युवा सैनिक की बहादुरी के गुणगान और प्रशंसा करते नहीं थकते होंगे.

हनीफ़ उद्दीन का जन्म दिल्ली में 23 अगस्त, 1974 को हुआ था. कैप्टन हनीफ़ उद्दीन एक जांबाज़ सिपाही होने के साथ-साथ एक उम्दा गायक भी थे. जब हनीफ़ मात्र 8 साल के थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी. पिता की मौत के बाद हनीफ़ और उनके दो भाइयों नफ़ीस व समीर के पालन-पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी उनकी मां हेमा अज़ीज़ पर आ गई. इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक सिंगल मदर के लिए तीन-तीन बच्चों को अकेले बड़ा करना बहुत ही मुश्किल काम है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हनीफ़ की मां एक शास्त्रीय संगीत गायिका हैं और उन्होंने दिल्ली में संगीत नाटक अकादमी और कथक केंद्र के लिए काफ़ी काम किया. हनीफ़ को म्युज़िक अपनी अम्मी से विरासत में मिला था.

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हाल ही में रचना बिष्ट, जो एक एक सेवारत सेना अधिकारी की पत्नी हैं, हनीफ़ की मां हेमा अज़ीज़ से मिलीं और स्वर्गीय कैप्टन के बारे में बात की. रचना बिष्ट और हेमा अज़ीज़ के बीच में जो भी बात हुई उसे रचना अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट लिखकर शेयर किया.

रचना ने अपनी पोस्ट में लिखा:

आज सुबह मेरी मुलाक़ात कारगिल शहीद कैप्टन हनीफ़ उद्दीन की मां से हुई और उनसे बात करके मुझे एहसास हुआ कि कहां से हनीफ़ के अंदर इतना साहस कहां से आया होगा. शास्त्रीय संगीत गायिका हेमा अज़ीज़ ने पति की मौत के बाद अपने बच्चों को एक सिंगल मदर बनकर पाला है.

हेमा ने रचना को बताया कि,

उन्होंने हनीफ़ के शहीद होने के बाद सरकार की ओर से पेट्रोल पंप के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. ठीक उसी प्रकार जैसे स्कूल की ओर से पिता न होने के कारण बच्चों को फ़्री यूनिफ़ॉर्म मिलने के प्रस्ताव को उन्होंने अस्वीकार किया था. मुफ़्त यूनिफ़ॉर्म को अस्वीकार करते हुए उन्होंने कहा था कि अपने टीचर को बोल देना कि मेरी मां हमारे ख़र्चे उठा सकती है, वो इतना कमा लेती है.

इसके साथ ही हेमा ने बताया,

हनीफ़ एक सैनिक था और अपने देश के प्रति अपना कर्तव्य कर रहा था. वो कभी नहीं चाहती थीं कि उनका बेटा अपनी जान बचाने के लिए युद्ध के समय वापस लौट आये.

कारगिल युद्ध के दौरान टुर्टुक एरिया में 25 साल की उम्र में कैप्टन हनीफ़ उद्दीन ने अपने सीने पर दुश्मनों की कई गोलियां खाई थीं. उनके शरीर में इतनी गोलियां लगी थीं कि 40 दिनों से ज़्यादा समय तक खोजने के बाद भी उनकी बॉडी नहीं मिली थी. जब आर्मी चीफ़ जनरल वी.पी मलिक ने हनीफ़ की मां को बताया कि हनीफ़ की बॉडी को वहां से लाया नहीं जा सका क्योंकि दुश्मन की तरफ से लगातार गोलियां चल रहीं थीं, तब हेमा अज़ीज़ ने आर्मी चीफ़ मलिक से कहा कि वो नहीं चाहती कि मेरे बेटे की बॉडी को लाने के चक्कर में दूसरे सैनिकों की जान खतरे में आये.

रचना बिष्ट की पोस्ट को फ़ेसबुक पर 6 हज़ार से ज़्यादा यूज़र लाइक कर चुके हैं और लगभग तीन हज़ार लोग शेयर कर चुके हैं.

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आखिर में कैप्टन हनीफ़ के भाई द्वारा लिखी उन लाइन्स को याद कर लेते हैं, जो हनीफ़ हमेशा गुनगुनाते रहते थे और अपने साथियों को भी सुनकर उनका हौसला बढ़ाते थे. ये पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं:

'एक पल में है सच सारी ज़िन्दगी का, इस पल में जी लो यारों, यहां कल है किसने देखा'