हमारे देश में रिसर्च के ऊपर काफ़ी कम ध्यान दिया जाता है. सरकार की तरफ़ से भी इस क्षेत्र की तरफ़ उदासीनता दिखाई देती है, तो देश की होनहार जनता भी इधर कम ही नज़र डालती है. ऐसे में कुछ लोग अपने जुनून और पक्के इरादों के बल पर ही इस क्षेत्र में आते हैं. आईआईटी दिल्ली के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर केदार खरे ने रिसर्च को मानव कल्याण का रास्ता बनाया है. अपनी पांच साल की कड़ी मेहनत के बाद केदार ने एक ऐसी डिवाइस बनाई है, जिसकी मदद से कैंसर कोशिकाओं की पहचान से लेकर और भी कई तरह के कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं.

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केदार ने अपनी इस टेक्नोलॉजी का पेटेंट भी करवा लिया है. केदार काफ़ी समय से Digital Holographic Microscopy (DHM) पर काम कर रहे हैं. इस टेक्नोलॉजी की मदद से किसी भी ऑब्जेक्ट का डिजीटल होलोग्राम बनाया जा सकता है. इसके लिए ख़ास तरह की लेजर की मदद ली जाती है.

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DHM तकनीक किसी भी और माइक्रोस्कोपिक तकनीक से ज़्यादा दक्ष है. इसकी मदद से किसी भी कोशिका की थिकनेस, वॉल्यूम और रेफ्रक्टिव इंडेक्स को पता किया जा सकता है.

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इस तकनीक से अब कैंसर कोशिकाओं का शुरूआती स्टेज पर ही पता चल जाया करेगा. इसके साथ ही कैंसर कोशिकाओं के 3D फॉर्म की स्टडी करने में काफ़ी आसानी रहेगी. इससे ट्रांसपेरेंट कोशिकाओं का भी आसानी से पता चल जायेगा.

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केदार द्वारा बनाई गई इस डिवाइस की कीमत फ़िलहाल 15 लाख के लगभग बैठती है. केदार आईआईटी खड़गपुर से पढ़े हुए हैं. इन्होंने ऑप्टिक्स में पीएचडी कर रखी है. इसके साथ ही University of Rochester से एक रिसर्चर के तौर पर भी जुड़े हुए हैं. पिछले साल दिसंबर से इन्होंने आईआईटी दिल्ली में अध्यापन शुरू किया है.

देश में अनेक प्रतिभाएं आर्थिक कारणों की वजह से आगे नहीं बढ़ पाती है. सरकार को रिसर्च के क्षेत्र के लिए कुछ नई नीतियां बनानी चाहिए, जिससे देशहित में नये-नये शोध किये जा सके.

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