भारत में क्रिकेट को धर्म की तरह पूजा जाता है. सचिन इस खेल के भगवान माने जाते हैं, लोग दीवानों की तरह क्रिकेट से प्यार करते हैं. लेकिन इन सब की शुरुआत कब हुई? आख़िर कैसे एक खेल देश की धड़कन बन गया?

इसे जानने के लिए वक़्त को थोड़ा पीछे करना होगा. ज़्यादा नहीं करीब 34 साल पीछे. उस वक़्त क्रिकेट में वेस्टइंडीज का बोल-बाला था. ऑस्ट्रेलिया, इग्लैंड और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों को मजबूत टीम माना जाता था. लेकिन भारत एक कमज़ोर टीम हुआ करती थी. 1983 से पहले हुए दो वर्ल्ड कप में वेस्टइंडीज ने अपना वर्चस्व दिखा दिया था. लेकिन साल 1983 अपने अंदर कुछ और ही छीपाए बैठा था. कमज़ोर समझी जाने वाली भारतीय टीम ने सेमीफ़ाइनल में पहले न्यूज़ीलैंड को हराया और इस मैच के नायक रहे उस दौर के कप्तान कपिल देव. इस जीत के बाद भारत ने फ़ाइनल में अपनी जगह बना ली थी.

लेकिन अभी भी कोई ये मानने को तैयार नहीं था कि भारत इस ट्रॉफ़ी को जीत सकता है. क्योंकि इस मैच में भारत की पारी की शुरुआत भी अच्छी नहीं रही और पूरी टीम 183 रनों पर ढेर हो गई. अब तो खुद भारत के लोगों को हार साफ़ दिख रही थी. लेकिन उन 11 खिलाड़ियों ने हार नहीं मानी थी. अपनी पूरी ताकत झोंक कर उन्होंने वेस्टइंडिज़ को हराया और वर्ल्ड कप अपने नाम कर लिया. इसके बाद तो जैसे भारत में क्रिकेट की लहर दौड़ गई.

भारत लौटने पर पूरी टीम का भव्य स्वागत हुआ. देश के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री इंदरा गांधी ने उनके स्वागत के लिए जश्न की तैयारी करवाई.

आज भी उस वक़्त की तस्वीरें देख कर एक अजीब सी खुशी का एहसास होता है. इसके 28 साल बाद धोनी और उनकी टीम ने भी भारत को वर्ल्ड कप ला कर दिया. लेकिन पहला प्यार हमेशा ही 1983 का वर्ल्ड कप ही रहेगा, जिसने भारत को इस खेल के लिए जुनून दिया. कपिल और उनकी पूरी टीम आज भी हमारी हीरो है.

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