फ़िल्में बनाना कोई हंसी-ठट्ठे का खेल नहीं है. ऐसा कभी नहीं होता कि बीती रात किसी को ख़ूबसूरत सपनें आए और अगली सुबह से वह फ़िल्में बनाने में लग गया. फ़िल्में बनाना अपने आप में एक बहुत ही उबाऊ-थकाऊ मगर उतना ही दिलचस्प पेशा है. फ़िल्मकार हर छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी चीज़ को सूक्ष्मता से देखने की कोशिश करता है. उसके रातों की नींद और दिन का चैन छिन जाता है. देश-दुनिया में जो कुछ भी अच्छा पढ़ा-लिखा गया है वो सब-कुछ पढ़ लेना चाहता है. पता नहीं कौन सा आइडिया क्लिक कर जाए. फ़िल्मकार एक बेहतरीन फ़िल्म बनाने से पहले न जाने कितनी ही फ़िल्में देख डालते हैं. वे फ़िल्में क्षेत्रीय भी होती हैं और विदेशी भी.

यहां ख़ास आप सभी के लिए पेश हैं बॉलीवुड के बेहतरीन फ़िल्मकारों की पसंदीदा फ़िल्में जो उनकी ज़िंदगी के लिए टर्निंग प्वाइंट और प्रेरणा रहीं...

1. जुनून – इम्तियाज़ अली

इम्तियाज़ ने उनकी पूरी ज़िंदगी में तो वैसे न जाने कितनी ही फ़िल्में देखी होंगी, मगर रॉकस्टार जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म का यह निर्देशक श्याम बेनेगल की ‘जुनून’ फ़िल्म को उसके दिल के बेहद नज़दीक मानता है. इम्तियाज़ वैसे तो सूफी संगीत के ख़ुद ही बहुत बड़े प्रेमी हैं, मगर श्याम बेनेगल साब की जुनून फ़िल्म में अमीर-खुसरो की मशहूर कव्वालियों ने उनके दिल पर गहरी छाप छोड़ी है. इस फ़िल्म को ख़ास मानने के पीछे कई वजहें हैं, जिनमें से एक है कि इस फ़िल्म में इस्लामिक संस्कृति की बारीकियां कुछ इस तरह दिखाई गई हैं जैसी रुपहले पर्दे पर पहले कभी नहीं दिखलाई गई हैं. इम्तियाज़ उनकी फ़िल्मी नज़र और परख के लिए बेनेगल साब की जुनून को काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार मानते हैं. ‘जुनून’ इम्तियाज़ के लिए रोमांस के इतिहास की यात्रा सरीखी चीज़ है.

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2. आनंद – राज कुमार हीरानी

आनंद बॉलीवुड के उन कुछेक फ़िल्मों में से एक है जो समय के पार जाती है. जो आलोचकों और प्रशंसकों के बीच बराबर सराही जाती है. राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन अभिनीत इस फ़िल्म ने राज कुमार हीरानी को भी ख़ासा प्रभावित किया है. राजू को यह फ़िल्म, इसके गीत और इसके भीतर की कविताएं कंठस्थ हैं. पीके फ़िल्म का निर्देशक इस फ़िल्म का इतना बड़ा प्रशंसक है कि आनंद फ़िल्म के डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा आनंद फ़िल्म के स्क्रीनप्ले बुक को वे आज भी सहेज कर रखे हुए हैं.

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3. रेजिंग बुल – दिबाकर बनर्जी

दिबाकर भारत के उन कुछेक और सौभाग्यशाली लोगों में थे जिन्हें मार्टिन स्कोर्सेसी की फ़िल्म रेजिंग बुल की रिलीज़ पर उसका ओरिजनल प्रिंट मिला था. इस फ़िल्म ने उनकी फ़िल्मों पर कुछ ऐसा असर छोड़ा कि वे आज भी इस फ़िल्म के दृश्यों को उद्धरित करते नहीं थकते. दिबाकर हर आकांक्षी फ़िल्मकार को रेजिंग बुल सजेस्ट करते हैं. वे कहते हैं कि यह फ़िल्म हर उस बंदे के लिए एक नज़ीर है जिसने सिनेमा की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली है.

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4. बाइसिकिल थीव्स – अनुराग कश्यप

अनुराग कश्यप इस पीढ़ी के उन कुछेक फ़िल्मकारों में से एक हैं जिनकी फ़िल्में देखते हुए हम बड़े हुए हैं. मगर यह शायद ही कोई जानता हो कि वे किन फ़िल्मों को देख कर बड़े हुए हैं. एक ऐसी फ़िल्म जो अनुराग कश्यप के दिल के बेहद नज़दीक है वो फ़िल्म है विटोरिया डी सिका की बाइसिकिल थीव्स. इस फ़िल्म ने उन्हें प्रेरणा दी कि वे उनकी तरह की फ़िल्में बनाएं. शायद इसी का परिणाम है कि उन्होंने गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फ़िल्म बनायी.

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5. अंडरग्राउंड – विक्रमादित्य मोटवानी

आप मोटवानी से उनकी सबसे यादगार फ़िल्मों के बारे में पूछिए जो उन्होंने देखी हो, और वे एमिर कुस्तुरिका की युद्ध पर आधारित अंडरग्राउंड फ़िल्म का नाम लेते हैं. युद्ध पर आधारित यह फ़िल्म मोटवानी की नज़र में सबसे अद्भुत फ़िल्मों में से एक है. इसमें कॉमेडी का ट्रीटमेंट भी अद्भुत है. मोटवानी उनके द्वारा देखी गई फ़िल्मों में इसे सबसे ऊपर रखते हैं और उनके नज़रिए के लिए इस फ़िल्म को ज़िम्मेदार मानते हैं.

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6. द शॉशैंक रिडेम्पशन – श्रीराम राघवन

बदलापुर फ़िल्म का डायरेक्टर इस बात को लेकर थोड़ी सी भी शर्मिंदगी नहीं महसूस करता कि उसने फ्रैंक डाराबोंट की शॉशैंक रिडेम्पशन के भारत में रिलीज़ से पहले ही उसका पाइरेटेड वर्जन देख लिया था, और राघवन इस डिसीजन को उनकी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन डिसीजन मानते हैं. वे कहते हैं कि इस फ़िल्म को देखने के बाद वे नि:शब्द से हो गए थे. राघवन इस फ़िल्म और इसकी विचारधारा से आध्यात्मिक लगाव महसूस करते हैं – वे कहते हैं कि डर आपको बांध कर रख सकता है तो वहीं उम्मीद की लौ आपको बचाए रखती है. वे कहते हैं कि इस फ़िल्म ने उन्हें कभी हार न मानने की प्रेरणा दी जिसकी वजह से वे आज एक फ़िल्म निर्देशक हैं.

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7. पाथेर पांचाली – शूजित सरकार

शूजित सरकार द्वारा बनायी गई फ़िल्में तो हम वैसे देखते ही रहे हैं, मगर मद्रास कैफे जैसी बेहतरीन फ़िल्म बनाने वाला यह निर्देशक सत्यजीत रे का जबर फैन है. सरकार को तो यह याद तक नहीं हैं कि उन्होंने अपू ट्रायलॉजी कितनी बार देखी है. वे कहते हैं कि वे सत्यजीत रे की फ़िल्मों और उनके सिनेमैटिक सेंस के दीवाने हैं. सरकार उनके द्वारा बनाई जा रही फ़िल्मों पर सत्यजीत साब की फ़िल्मों का ख़ासा असर मानते हैं, लेकिन इस सबके बीच पाथेर पांचाली उनकी पसंदीदा फ़िल्म है.

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8. Butch Cassidy & The Sundance Kid – तिग्मांशु धूलिया

तिग्मांशु वैसे तो एक फ़िल्म निर्देशक हैं, मगर इधर पिछले कई सालों से उन्हें भारत की जनता एक अभिनेता के तौर पर भी जानने-पहचानने लगी है. गैंग्स ऑफ वासेपुर में रामाधीर सिंह का किरदार आख़िर किसे याद नहीं? मगर वे उनके सिनेमाटिक सेंस के लिए जॉर्ज रॉय हिल की फ़िल्म Butch Cassidy & The Sundance Kid को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. तिग्मांशु कहते हैं कि इस फ़िल्म ने उनके फ़िल्मों की समझ बनाने में काफ़ी मदद की है. वे इस फ़िल्म को कई बार देख चुके हैं और फिर भी उनका मन नहीं भरता. धूलिया का मानना है कि इस फ़िल्म में वो सब-कुछ है जो एक हिट हिन्दी फ़िल्म को बनाने के लिए चाहिए होता है.

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9. सलाम बॉम्बे – ज़ोया अख़्तर

आप सलाम बॉम्बे की बात शुरू ही करते हैं कि ज़ोया उनके बचपने में चली जाती है. उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में यह फ़िल्म पर्दे पर देखी थी. तब से ही वे इस फ़िल्म को उनका दिल दे बैठीं. इस फ़िल्म से प्रेरणा और प्रभावित होकर ही उन्होंने फ़िल्मों का रुख किया. ज़ोया बताती हैं कि इस फ़िल्म में हर चीज़ जैसे परफेक्ट है. इस फ़िल्म को न एक ट्रैजिडी के तौर पर दर्शाया गया है और न ही किसी उत्सव की तरह, इसके बावजूद यह फ़िल्म ज़िंदगी से भरपूर है.

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10. श्री 420 – राकेश रोशन

वैसे तो राकेश रोशन साब पहले फ़िल्मों में अभिनेता हुआ करते थे जिन्होंने निर्देशक के तौर पर भी कई फ़िल्में दीं. मगर यह मशहूर और बेहद सफल फ़िल्मकार प्रेरणा हेतु राज कपूर साब की श्री 420 की तरफ़ रुख करता है. वे कहते हैं कि यह आज के ज़माने में बन रही फ़िल्मों से कहीं आगे है. चाहे को टेक्नोलॉजी का मामला हो या फिर ट्रीटमेंट का. राकेश रोशन कहते हैं कि डायलॉग, अभिनेताओ का उनके किरदारों को जीना और इस फ़िल्म का संगीत सब-कुछ परफेक्ट है.

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11. दिल चाहता है – अयान मुखर्जी

अयान मुखर्जी हमारी पीढ़ी के उन कुछेक फ़िल्मकारों में हैं जो हर बार कुछ अलग और फ्रेश ट्रीटमेंट लेकर आते हैं. चाहे आप वेक अप सिड देख रहे हों या फिर ये जवानी है दीवानी. उनकी फ़िल्मों के किरदारों में एक अल्हड़पन और खिलंदड़पना देखने को मिलता है. मगर कोई एक फ़िल्म जो इस युवा फ़िल्मकार के लिए ख़ास मायने रखती है वो फ़िल्म है, “दिल चाहता है.” वे इस फ़िल्म के ट्रीटमेंट और किरदारों से लगातार प्रेरणा लेते हैं. अब जीनियस शायद ऐसे ही बनते हैं.

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12. मेघे ढाका तारा – अमोल गुप्ते

अमोल गुप्ते जब ऋत्विक घटक की फ़िल्म मेघे ढाका तारा की बात करते हैं तो जैसे किसी दूसरे ही दौर में चले जाते हैं. यह फ़िल्म आज भी उनकी आंखों में आंसू ले आती है. इस फ़िल्म का एक-एक दृश्य उनके ज़ेहन में तरो-ताज़ा है. अमोल इस फ़िल्म को न सिर्फ़ सबसे ख़ूबसूरत फ़िल्म बल्कि ज़िंदगी मानते हैं. उनके लिए यह फ़िल्म बाइबिल की तरह है. अब इस बात को जानने के बाद तो यह फ़िल्म देखनी ज़रूरी हो गई है.

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13. हम आपके हैं कौन! – करण जौहर

करण जौहर की फ़िल्में वैसे तो भारतीयता और उत्सव की द्योतक हैं, मगर क्या आपने ऐसा कभी सोचा है कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिली? उन्हें यह प्रेरणा “हम आपके हैं कौन"फ़िल्म देख कर मिली. इस फ़िल्म को वे कई बार देख चुके हैं और शायद इसी फ़िल्म का असर है कि वे लार्जर दैन लाइफ़ और भारतीय रीति और परम्पराओं की चाशनी में डूबी हुई फ़िल्मों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं. अगर उन्हें ऐसी फ़िल्मों का ब्रांड ऐम्बेस्डर कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

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14. शोले – रोहित शेट्टी

भारत के सिनेमाई इतिहास में शायद ही ऐसी कोई फ़िल्म बनी हो जिसके सारे किरदार कालजयी हो गए. जिसने सफ़लता के सारे पुराने कीर्तिमान तोड़ दिए.
इसने भारतीय हिन्दी सिनेमा इंडस्ट्री में एक नये दौर की शुरुआत की. इस फ़िल्म ने आम भारतीय दर्शकों की तरह रोहित शेट्टी को भी प्रभावित किया और वे फ़िल्मों की तरफ़ मुड़ गए. सिंघम जैसी हिट फ़िल्म के निर्देशक के अनुसार यह बॉलीवुड की बेस्टेस्ट फ़िल्म है.

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15. अर्जुन – फराह खान

फराह खान वैसे तो हॉलीवुड फ़िल्में देखने की शौकीन हैं, मगर इसके बावजूद उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म राहुल रावैल की “अर्जुन” है. फराह इस फ़िल्म के निर्देशक से इस कदर प्रभावित थीं कि फ़िल्म निर्माण और निर्देशन सीखने के लिए वे राहुल रावैल के मातहत काम करने को भी तैयार हो गई थीं.

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16. गाइड – मधुर भंडारकर

मधुर भंडारकर इस एक फ़िल्म को लेकर कहते हैं कि यह फ़िल्म देव साहब की कालजयी फ़िल्म है जिसमें उन्हें इतिहास में अमर रखने की क्षमता है. यह उनके लिए भावनात्मक और बेहद जुड़ाव वाला सफ़र है. इस फ़िल्म का नज़रिया, ट्रीटमेंट और कैमरे का इस्तेमाल तो बस बेजोड़ है. मधुर आज भी इस फ़िल्म को देखना पसंद करते हैं. यह फ़िल्म शायद उनके लिए पुरानी शराब सरीखी हो.

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17. द बैटल ऑफ़ अल्जीयर्स – मीरा नायर

मीरा नायर भारत की उन चुनिंदा फ़िल्मकारों में हैं जिन्हें भारत में आलोचना और भारत के बाहर ख़ासी प्रसिद्धि मिली है. वे सिस्टम के साथ चलने के बजाय उसके ख़िलाफ़ होने में विश्वास रखती हैं. वे फ्रांसीसी अत्याचार के ख़िलाफ़ अल्जीरिया के संघर्ष पर बनी फ़िल्म से ख़ासी प्रभावित हैं. वे कहती हैं कि यदि उन्हें ऐसे मौके मिलते, तो वे इस एक फ़िल्म को ज़रूर निर्देशित करतीं. बहरहाल उनकी फ़िल्मों को देख कर उनकी ये बात सच के ज़्यादा करीब लगती है.

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18. अपराजितो – सुजॉय घोष

दर्शकों को अंत तक बांध कर रखने वाली फ़िल्म “कहानी” और “अहल्या” जैसी शॉर्ट फ़िल्म के निर्देशक का दिल अपराजितो फ़िल्म के लिए धड़कता है. वे बताते हैं कि अपराजितो सत्यजीत रे साब की एक क्लासिक फ़िल्म है. इस फ़िल्म को बने हुए कई साल बीत चुके हैं, मगर यह फ़िल्म हर बार पुरानी शराब का मज़ा देती है.

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19. नयाकण – संजय गुप्ता

संजय गुप्ता बॉलीवुड सिनेमा इंडस्ट्री के उन कुछेक फ़िल्मकारों में से हैं जो रोमांच और ऐक्शन को एक साथ पिरोने में माहिर हैं. लेकिन जब आप उनसे उनकी फेवरेट और प्रेरणाप्रद फ़िल्म के बारे में पूछेंगे तो वे कमल हासन की नयाकण फ़िल्म का जिक्र करते हैं. वे कहते हैं कि फ़िल्मों का समाज के प्रति भी एक तरह का व्यापक दायित्व होता है, जिसे इस फ़िल्म ने बख़ूबी निभाया है.

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20. Casablanca – अनुराग बसु

एक ऐसा फ़िल्मकार जो निजी तौर पर मुझे बेहद पसंद है. यह शख़्स पर्दे पर प्रेम कहानियों को इस तरह बुनता है जैसे वह फ़िल्म न होकर कोई परीकथा हो.
वे कहते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बैकग्राउंड में बनी Casablanca नामक फ़िल्म तो बस बेजोड़ है. इस फ़िल्म ने ही अनुराग को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे फ़िल्म निर्माण में हाथ आजमाएं. और हम तो इसके लिए Casablanca को धन्यवाद देते नहीं थकते.

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तो भैया, जब हमनें इन सारे फ़िल्म निर्देशकों की पसंदीदा और प्रेरणास्त्रोत फ़िल्में आपके सामने खोल कर रख दी हैं, तो आपका भी फर्ज बनता है कि इन फ़िल्मों को देखें और अपने दोस्तों के लिए आगे बढ़ाएं. हो सकता है कि आपमें या उनमें ही कोई निर्देशक छिपा बैठा हो जिसे इस लिस्ट की ज़रूरत हो.