15 अप्रैल, 1994 को एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, नाम था '1942: अ लव स्टोरी'. फ़िल्म की कहानी ब्रिटिश काल के भारत पर आधारित थी. उस दौर यानि 90 के दशक में जहां फ़िल्मों से ज़्यादा उनके गाने और सिंगर्स हिट हो रहे थे, वहीं दशक का अंत होते-होते फ़िल्मों के साथ-साथ उनका म्युज़िक भी फ़्लॉप होने लगा था. मगर विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में बनी '1942: अ लव स्टोरी' ने पर्दे पर आते ही धमाल मचा दिया. हालांकि, फ़िल्म कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पाई थी, लेकिन फ़िल्म के संगीत लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर बोल रहा था. उस दौर की सुपर-डुपर हिट म्युज़िक एलबम थी '1942: अ लव स्टोरी'.

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वैसे तो इस फ़िल्म के गाने चाहे वो 'ये सफ़र बहुत है कठिन मगर... कुछ न कहो, कुछ भी न कहो..., प्यार हुआ चुपके से हो..., या फिर एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा..., हर गाना दिल को सुकून देने वाला था. ये सभी गाने इतने सुरीले थे कि म्यूज़िक एलबम के रिलीज़ होने से लेकर आज तक लोगों की प्लेलिस्ट में अपनी जगह बनाये हुए हैं. ऐसा होना तो स्वाभाविक ही था क्योंकि इसका संगीत आर डी बर्मन ने दिया था, और फ़िल्म के बोल लिखे थे शब्दों के जादूगर जावेद अख़्तर साहब ने.

पर आज हम आपको इस सुपर हिट एलबम से जुड़ा एक ख़ास किस्सा बताने जा रहे हैं. ये है गाने 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...', गाने के बनने का मज़ेदार किस्सा. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस फ़िल्म में ये गाना था ही नहीं, मतलब की ऐसा कोई गाना पहले फ़िल्म के लिए लिखा ही नहीं गया था.

दरअसल, जब फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने जावेद अख्तर साहब को फ़िल्म के गीत लिखने के लिए स्क्रिप्ट सुनाई, क्योंकि जावेद साब एक अच्छे स्क्रिप्ट राइटर भी थे तो उन्होंने उस सीन 'जब हीरो नरेन सिंह (अनिल कपूर) हीरोइन रज्जो पाठक (मनीषा कोइराला) को ढूंढने के लिए गांव जाता है...,' तो उस सिचुएशन में एक गाना होना चाहिए. मगर बजट और तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए विधु जी इस बात के लिए राज़ी नहीं हुए. पर जावेद सब भी कहां मानने वाले थे वो बार-बार चोपड़ा जी को ये बात बोल रहे थे. तब जावेद जी से पीछा छुड़ाने ले लिए विधु जी उनसे बोले... ठीक है चलिए आप गाना लिखिए फिर देखते हैं.'

पर कुछ दिन बीत गए और जब अगली मीटिंग हुई, तो जावेद साब ने तो कोई गीत लिखा ही नहीं था... क्योंकि वो सोच रहे थे कि विधु को कौन सा याद होगा कि कोई गीत लिखना था...

और जब वो मीटिंग के लिए विधु विनोद चोपड़ा और कंपोज़र आर डी बर्मन के पास पहंचे, विधु जी ने उनसे पहूंचते ही पूछा - गीत लिखा आपने?'

अब जावेद साब तो हैरान हो गए, लेकिन उन्होंने बड़ी चतुराई से कहा,

'मैंने सोचा कि आप इंट्रेस्टेड नहीं है तो क्या ही कोई गीत लिखूं, वरना तो ऐसा कुछ सोच रहा था - एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.’

ये सुनते ही बर्मन साब ने बोला, 'लिखो इस गाने को तुरंत.' अभी चाहिए, अब जावेद साहब ने तो ऐवइं बोल दिया था, पर बैठ गए एक कोने में कागज़ और कलम लेकर.

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और कुछ यूं लिखा गीत का अंतरा,

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख्वाबजैसे उजली किरण, जैसे बन में हिरन.जैसे चांदनी रात, जैसे नरमी की बातजैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया.

ये लाइन्स बर्मन दा और विधु दोनों को ही बहुत भाया. साथ ही बर्मन दा ने जावेद जी से कहा कि पूरे गाने में यही फील रखना, मतलब की हर लाइन में एक उपमा होनी चाहिए. जावेद साब ने कहा, ठीक है, ‘आप म्यूज़िक तो बनाइए.’ तुरंत ही बर्मन दा बोले धुन तो बना भी ली मैंने और बजाने लगे.' फिर जावेद साब ने थोड़ी मोहलत लेकर बेहद खूबसूरती से लिखा ये गाना.

और पूरे दो दिनों में बना ये आइकॉनिक गाना... जिसमें लड़की को 21 उपमाएं दी गयीं. जावेद साब ने इसमें लड़की को मासूम और बेहद ख़ूबसूरत दिखाया है अपनी उपमाओं से, जिनमें शराब, शबाब, हुस्न, लब जैसे शब्दों का कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया गया है. आज भी ये गीत हिंदी गानों के इतिहास में एक ख़ास जगह बनाये हुए है.

एक अच्छे गाने के बनने का ये रोचक किस्सा आपको कैसा लगा कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताइयेगा. आगे भी हम आपके लिए ऐसे किस्से लेकर आते रहेंगे.