आज सिने जगत में कपूर फै़मिली किसी पहचान की मोहताज नहीं है. कपूर क्लैन इस इंडस्ट्री की सबसे पुरानी और मज़बूत डोर है. 4 पीढ़ियों से ये शोबिज़ बिज़नेस में हैं. आज हम राज कपूर से लेकर रणबीर और करीना कपूर तक, इस फै़मिली को पहचानते हैं, लेकिन इस इंडस्ट्री में इस फै़मिली की नींव रखी राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर ने. 'मुगल-ए-आज़म' में अकबर का आइकॉनिक किरदार तो याद होगा आपको, वही दमदार आवाज़ और शख्सियत वाले एक्टर हैं पृथ्वीराज कपूर. इन्होंने सिनेमा को विकसित करने में बड़ा योगदान दिया और सिर्फ़ सिनेमा ही नहीं, इन्होंने थिएटर को भी नए आयाम दिए. आज हम आपको बताते हैं इनके बारे में कुछ दिलचस्प बातें-

कैसे की शुरुआत

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पृथ्वीराज कपूर नॉन फिल्मी बैकग्राउंड से थे. उन्होंने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत फै़सलाबाद और पेशावर के थिएटर्स से की. इसके बाद 1928 में वो अपनी आंटी से लोन लेकर मुंबई आए. यहां उन्होंने Imperial Films Company जॉइन की. थिएटर हमेशा पृथ्वीराज का पहला प्यार रहा, फिल्मों के साथ-साथ वो हमेशा थिएटर में भी एक्टिव रहे. उन्होंने एक इग्लिंश थिएटरिकल कंपनी Grant Anderson Theater Company जॉइन की. ये थिएटर के लिए उनका लगाव ही था, जिसके चलते उन्होंने 1944 में अपना थिएटर ग्रुप पृथ्वी थिएटर शुरू किया. इसके बनने के 16 सालों में करीब 2,662 परफॉर्मेंसेज़ हुई और पृथ्वीराज ने हर एक शो में लीड एक्टर का रोल किया. बाद में आर्थिक समस्याओं के चलते ट्रैवल थिएटर चलाना मुश्किल हो गया था. लेकिन उनके बेटे शशि कपूर और पत्नी जेनिफर केंडल ने पृथ्वी थिएटर को इंडियन शेक्सपीयर थिएटर कंपनी "Shakespeareana" में मर्ज कर दिया. तब 1978 में मुंबई में पृथ्वी थिएटर का मुहूर्त हुआ.

फ़िल्मों में दी दस्तक

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पृथ्वीराज का एक्टिंग सफर थिएटर पर ख़त्म नहीं हुआ. अपनी पहली फ़िल्म 'दो धारी तलवार' में पृथ्वीराज एक्स्ट्राज़ में थे. लेकिन वो ज़्यादा वक्त तक एक्स्ट्रा नहीं रहे, अपनी तीसरी ही फ़िल्म 'सिनेमा गर्ल' में उन्हें लीड रोल मिला. पृथ्वीराज ने 9 साइलेंट फ़िल्में करने के बाद पहली बोलती फ़िल्म, 'आलम आरा' में भी सपोर्टिंग रोल किया. सोहराब मोदी की फ़िल्म 'सिकंदर' में Alexander The Great के किरदार के लिए उन्हें बेहद सराहना मिली. अपने 50s में पृथ्वीराज ने थिएटर छोड़ दिया, अब वो कभी-कभी फिल्मों में काम कर लेते थे.

अकबर के रूप में हमेशा रहेंगे ज़िंदा

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शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने 'मुगल-ए-आज़म' न देखी हो. इस फ़िल्म में अनारकली और सलीम के अलावा, जिस किरदार ने सबसे ज़्यादा असर छोड़ा, वो था अकबर का किरदार. इस रोल को पृथ्वीराज कपूर ने प्ले किया था. ये फ़िल्म देखने के बाद, अब जब भी अकबर की बात होती है, तो हमारे दिमाग़ में वही रुतबा और पर्सनैलिटी आने लगती है. अकबर का किरदार पृथ्वीराज के बिना शायद हम सोच भी नहीं सकते. फ़िल्म के इतने सालों बाद अगर आज भी अकबर को स्क्रीन पर दिखाया जाता है, तो उसका लहज़ा और बॉडी लैंग्वेज बिल्कुल वही होती है, जो पृथ्वीराज के अकबर की थी. उन्होंने इस किरदार को आइकॉनिक बना दिया. हिंदी सिनेमा में पृथ्वीराज के योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण और दादासाहब फ़ालके अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया.

तो कुछ ऐसा था पृथ्वीराज कपूर का कद, जिससे मिले उसी के हो लिए या उन्हें अपना बना लिया...