थक कर न बैठ, ए मंज़िल के मुसाफ़िर,
मंज़िल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा.

अगर दिल में कुछ कर गुज़रने की चाह हो, तो इंसान तमाम बाधाओं को पार कर, अपनी मंज़िल तक पहुंच ही जाता है. अगर आपको लगता है कि ये बातें सिर्फ़ बोलने में ही अच्छी लगती हैं, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. बल्कि कई लोग इसका जीता-जागता सबूत भी हैं.

आज हम आपको मिलवाते हैं, एक ऐसी लड़की से जिसका बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था. छोटी-सी उम्र में जिसके सिर से पिता का साया उठ गया, मां ने रेलवे स्टेशन पर सब्ज़ी बेचकर परिवार का पालन-पोषण किया. बेहद कठिन हालातों में बचपन व्यतीत करने वाली ये लड़की कोई और नहीं, बल्कि 19 साल की इंटरनेशनल बॉक्सर जमुना बोडो हैं.

इस इंंटरनेशनल बॉक्सर की मां निर्माली बोडो, असम के शोणितपुर ज़िले के बेलसिरि गांव में रेलवे स्टेशन के बाहर सब्ज़ी बेचती है. इस आदिवासी महिला के 3 बच्चे हैं, जिसमें से एक बेटा और दो बेटियां हैं.

जमुना ने इंटरनेशन लेवल पर ये मुकाम, बिना किसी ख़ास सुविधा या संसाधन के हासिल किया है. जमुना ने शुरुआत, तो गांव में वुशु खेलने से की थी. लेकिन बाद में उन्होंने बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेना शुरू किया. जमुना अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपनी मां को देती हैं. बातचीत के दौरान जमुना ने बताया, 'जब मेरे पिता की मृत्यु हुई, उस वक़्त मैं महज़ 10 साल की थी. पिता की मृत्यु के बाद से मेरी मां ने हम तीन भाई-बहनों को पाला है. गांव में कुछ बड़े लड़के वुशु खेला करते थे. पहले मैं खेल देखने के लिए जाती थी, लेकिन बाद में मेरा भी मन हुआ कि मैं ये फ़ाइट सीखूं.'

2014 में रूस में आयोजित एक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने वाली जमुना, साल 2015 में ताइपे में हुई यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत की तरफ़ से खेलते हुए, 57 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक भी हासिल कर चुकी हैं.

मेरी कॉम को अपना आदर्श मानने वाली जमुना, 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों में मेडल जीत कर, भारत का नाम रोशन करना चाहती हैं.

Source : topyaps