पेड़ हमारे लिए कितने ज़रूरी हैं, इसका पता हमें खासतौर से तब चलता है, जब हम किसी हिल स्टेशन घूमने जाते हैं. वो खुली हवा के थपेड़े जब चेहरे पर पड़ते हैं, तब एहसास होता है कि ​हमें घुटन में रहने की आदत-सी पड़ गई है. हम एक तरफ़ पेड़ लगाने की सोचते हैं, दूसरी ओर हमारे रीति-रिवाज़ ही हमारी कोशिशों के आड़े आ जाते हैं. हिन्दू धर्म में अंतिम संस्कार के लिए काफ़ी लकड़ियों को इस्तेमाल होता है, जिसके चलते रोज़ाना हज़ारों पेड़ काटे जाते हैं.

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इस अजीब सी समस्या का समाधान निकाला है जयपुर की श्री नारायणधाम गोशाला ने. इस गोशाला में अब गोबर की लकड़ी यानि गोकाष्ठ बनाने का कार्य तेज़ी से चल रहा है. अब तक गोकाष्ठ से दो अंतिम संस्कार हो चुके हैं. गोशाला से जुड़े विष्णु अग्रवाल जी के अनुसार, ये विचार गोशाला संचालन समिति को तब आया, जब इंदौर में कंडों से होलिका दहन की बात सामने आई. इसके अलावा नागपुर में गाय के उपलों से अंतिम संस्कार किए जाते हैं. वहीं से ये जानकारी मिली की गोबर से उपले और लकड़ी बनाने की मशीन अहमदाबाद, ​हरियाणा और दिल्ली में मिलती है. इसके बाद समिति ने से मशीन लगवाने का विचार किया. ये गोशाला जयपुर के पास बगरू में है और यहां 6 हज़ार गाय हैं.

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क्या है फ़ायदा?

विष्णु ने बताया कि ये तरीका गाय और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद है. इससे हानिकारक गैस नहीं बनती, पेड़ बचता है और गाय के चारे का खर्च भी निकल आता है. एक अंतिम संस्कार में 15 साल के करीब दो पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल होता है.

60 क्विंटल गोबर से 15 क्विंटल लकड़ी बनती है

विष्णु के अनुसार 60 क्विंटल गोबर से 15 क्विंटल लकड़ी बनाई जाती है. यानि गोकाष्ठ की कीमत 10-11 रुपए प्रति किलो पड़ती है. लकड़ी के मुकाबले गोकाष्ठ 2/3 इस्तेमाल होता है. इसका खर्च करीब उतना ही होता है, लेकिन पेड़ बच जाते हैं और साथ ही साथ एक अंतिम संस्कार से 40 गाय के चारे का खर्च निकल जाता है.

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कैसे बनता है गोकाष्ठ

इस मशीन में ताज़ा गोबर डाला जाता है, जिसके बाद इसमें लगे लकड़ी के आकार के सांचे इन्हें लकड़ी का आकार दे देते हैं. इसके बाद इन्हें निकाल कर 5 से 6 दिन धूप में रखा जाता है, जिससे इसका पानी सूख जाए और ये सख्त हो जायें.

इस गोशाला की ये पहल एक बेहतरीन आईडिया है प्रदूषण और पेड़ बचाने के लिए.

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