देशद्रोह के आरोप में पिछले 3 हफ़्तों से हवालात में समय बिता रहे कन्हैया कुमार आख़िरकार अंतरिम बेल पर बाहर आ गए हैं. मीडिया, केंद्रीय सरकार और अंध देशभक्ति में लिप्त कुछ लोगों ने उन्हें कोर्ट के फैसले से पहले ही गुन्हेगार साबित कर दिया था. कोर्ट के बाहर जिन वकीलों ने मीडियाकर्मियों और जेएनयू छात्रों पर हमला किया था, उनका सच तो सामने आ ही गया है. अब बारी थी, कन्हैया को अपने हिस्से का सच बताने की, जो उन्होंने अपने भाषण में निर्भीकता से बताया.

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सैकड़ों जेएनयू छात्रों की भीड़ के बीच खड़े कन्हैया ने अपने भाषण की शुरुआत उन्हीं नारों से की थी, जिसकी वजह से उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. बस फ़र्क़ ये था कि 9 फरवरी के नारों को कुछ मीडिया चैनल्स ने जिस तरह से तोड़ा-मरोड़ा था, वहीं कन्हैया ने उन नारों का सच चिल्ला-चिल्ला कर बताया. कन्हैया को आज़ादी चाहिए भुखमरी से, जातिवाद से, मनुवाद से, भ्रष्टाचार से.

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उन्होंने कहा कि 'हमें भारत से आज़ादी नहीं चाहिए, भारत में आज़ादी चाहिए'.

कन्हैया ने भ्रष्ट मीडिया चैनल, एबीवीपी, आरएसएस, भाजपा, शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आड़े हाथों लेते हुए उन पर कटाक्ष किया. उन्होंने कहा कि 'प्रधानमंत्री मन की बात तो करते हैं, लेकिन अपने मन की बात नहीं सुनते'. सरकार पर निशाना साधते हुए और शहीद सैनिकों की बात करते हुए कन्हैया ने ये भी कहा कि जो भाई सरहद पर शहीद होते हैं, देश में उनके ही किसान मां-बाप भुखमरी और गरीबी की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं.

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यहां देखिये कन्हैया कुमार का पूरा भाषण...

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एक बात तो तय है, कन्हैया कुमार अब एक छात्र से ऊपर उठ चुके हैं और ये उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत है. कई राजनैतिक पार्टियां ज़रूर उन्हें अपने दल में लेने के लिए उत्सुक होंगी, क्योंकि ऐसा ज्वलनशील और साहसी भाषण किसी स्टूडेंट लीडर से सुने हुए सदियों हो गए थे. कई लोगों ने तो उनका समर्थन करते हुए ये भी कहा कि 2019 के आम चुनावों में कन्हैया को प्रधानमंत्री पद के लिए खड़ा होना चाहिए. मेरे हिसाब से तो ये सही नहीं है. सिर्फ़ एक भाषण के आधार पर उन्हें देश का लीडर चुनना उतावलापन है. साथ ही अभी उन्हें सिर्फ़ शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से साबित करना होगा कि वो सच में देश के लोगों के हितों के बारे में सोचते हैं. उनकी राह लम्बी है, जटिल है और कठिन है. अभी तो उन्हें कोर्ट ने सिर्फ़ 6 महीने की ज़मानत दी है. अगर कन्हैया नायक की भूमिका में आना चाहते हैं तो उन्हें बहुत मेहनत और संघर्ष करना होगा. वो सफल होंगे कि नहीं, ये तो समय ही बताएगा, लेकिन आशा करते हैं कि जिस आज़ादी की मांग कन्हैया कर रहे हैं, वो हर भारतीय और देशभक्त को ज़रूर मिले.

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